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प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाना सीखें | प्रोजेक्ट के लाभ, उद्देश्य और विशेषताएँ

क्या आपको मालूम है, बैंकों से किसी भी प्रकार का व्यावसायिक ऋण (लोन) लेने या सरकारी सुविधाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए आपको प्रोजेक्ट रिपोर्ट की जरूरत होती है।

जी हाँ, इनमें से कोई भी या दोनों को प्राप्त करने के लिए आपको प्रोजेक्ट रिपोर्ट प्रस्तुत करने की जरूरत होती है। प्रोजेक्ट रिपोर्ट को हिन्दी में परियोजना प्रतिवेदन कहते हैं।

प्रस्तुत लेख में हम प्रोजेक्ट रिपोर्ट के संबंध में विस्तार से बताने वाले हैं जैसे  प्रोजेक्ट रिपोर्ट क्या है, प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने के उद्देश्य, प्रोजेक्ट रिपोर्ट की विशेषताएँ, प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने के लाभ और प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाते समय ध्यान रखने योग्य बातें, प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाना आदि

प्रोजेक्ट रिपोर्ट क्या है

प्रोजेक्ट रिपोर्ट यह व्यावसायिक इकाई से संबंधित एक लिखित दस्तावेज है।

इसमें प्रस्तावित व्यावसायिक इकाई की संपूर्ण कार्य योजना की जानकारी विस्तार से उपलब्ध कराई जाती है। यह प्रतिवेदन, परियोजना क्रियाओं के अनुक्रम को भी दर्शाता है एवं व्यावसायिक इकाई की समस्त संचालन क्रियाओं का मार्गदर्शन भी करता है।

एक आदर्श प्रोजेक्ट रिपोर्ट में व्यावसायिक इकाई का उद्देश्य, वित्तीय संरचना, विभिन्न भौतिक संसाधनों की जरूरत, व्यवस्था, स्थापना, संचालन, उत्पाद या सेवा का निर्माण, विपणन से संबंधित सभी जानकारी को शामिल किया जाता है।

इसे एक प्रभावी व्यावसायिक उपक्रमों के लिए एक गहन रोड मैप के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है।

संक्षेप में प्रोजेक्ट रिपोर्ट व्यवसायों में होने वाली समस्त गतिविधियों का एक विस्तृत विवरण प्रदान करती है यह विवरण व्यापार एवं अन्य क्षेत्रों में महत्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं।

इन विवरणों से व्यवसाय द्वारा किए गए प्रदर्शन का विश्लेषण करने में भी मदद मिलती है इसलिए परियोजना प्रतिवेदन बनाना प्रत्येक नए उद्यमी के लिए बहुत महत्वपूर्ण कार्य है।

प्रोजेक्ट रिपोर्ट प्रस्तावित व्यावसायिक गतिविधि की संभावनाओं का पता लगाने के लिए मार्केट रिसर्च एवं उत्पाद अथवा सेवा का चयन करने के बाद ही बनाई जाती है।

उद्यमी को अपनी प्रस्तावित परियोजना की उपयुक्तता एवं औचित्य स्वयं साबित करना होगा। इसके लिए उसे परियोजना की ताकत को उजागर करना होगा और कमजोरियों को दूर करने के उपाय बताना होगा।

प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने के उद्देश्य

एक व्यावसायिक परियोजना रिपोर्ट आमतौर पर निम्नलिखित उद्देश्यों के साथ तैयार की जाती है।

  1. परियोजना प्रतिवेदन विभिन्न बैंकों, वित्तीय संस्थाओं तथा विनियोग निगमों से वित्तीय सहायता प्राप्त करने के लिए बनाई जाती है।
  2. विभिन्न मामलों में परियोजना को सरकारी विभाग और जिला उद्योग केंद्र को भेजना अनिवार्य है। इसलिए इसे बनाया जाता है।
  3. प्रोजेक्ट रिपोर्ट में दर्शाए अनुसार अनुमानित लागत व सम्भावित आय की तुलनात्मक समीक्षा करके नई व्यावसायिक इकाई की लाभप्रदता तथा सुदृढ़ता की जाँच की जा सकती है।
  4. सरकार और अन्य संस्थानों द्वारा कर छूट, सब्सिडी, सुविधाएँ और प्रोत्साहन प्राप्त करने के लिए एक उपयुक्त आधार प्रदान करती है।
  5. इसके आधार पर ही विनियोग प्रस्ताव की लाभदायकता तथा व्यवहार्यता का अध्ययन किया जा सकता है, एवं सन्तुष्ट होने पर ही इकाई को वित्तीय सहायता दी जा सकती है।
  6. प्रोजेक्ट रिपोर्ट किसी व्यवसाय के निवेश और नियोजन निर्णयों के लिए एक व्यवस्थित दृष्टिकोण है।

प्रोजेक्ट रिपोर्ट की विशेषताएँ

  1. एक अच्छी परियोजना रिपोर्ट लक्षित बाजार पर केंद्रित होती है।
  2. इसमें एक शक्तिशाली व्यवसाय रणनीति शामिल की जा सकती है।
  3. इसमें आर्थिक, तकनीकी, वित्तीय, प्रबंधकीय और उत्पादन पहलुओं पर सटीक जानकारी शामिल रहती है।
  4. यह व्यवसाय शुरू करने के संबंध में विभिन्न संदेहों और प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत करती है।

प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने के लाभ

परियोजना रिपोर्ट बनाने से उद्यमियों को निम्न लाभ प्राप्त होते हैं।

  1. प्रोजेक्ट रिपोर्ट से यह सरलता से ज्ञात किया जा सकता है किसी व्यवसाय को शुरू करने की अनुमानित लागत कितनी आएगी।
  2. उससे कितनी आय प्राप्त होगी।
  3. इससे प्रस्तावित व्यवसायिक इकाई में उपलब्ध संसाधनों की संपूर्ण जानकारी आसानी से प्राप्त की जा सकती है।
  4. व्यावसायिक इकाई का पंजीयन, उद्योग लगाने हेतु भूमि का आबंटन, ऋण स्वीकृति, अनुदान स्वीकृति, बिक्री पर छूट, करों में छूट, कच्चे माल का कोटा आबंटन एवं अन्य सहायताओं आदि का लाभ प्राप्त करने के काम आती है।
  5. निवेशकों द्वारा परियोजना प्रतिवेदन से उक्त इकाई में निवेश के अवसरों का मूल्यांकन किया जा सकता है।
  6. आवश्यकता होने पर व्यवसायिक इकाई के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त की जा सकती है।
  7. प्रोजेक्ट रिपोर्ट यह शुरू की जाने वाली इकाई का एक संक्षिप्त विवरण तथा दर्पण है।
  8. अनेक मामलों में यह उद्यमी के समय तथा शक्ति को भी बचाता है।

प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनते समय ध्यान रखने योग्य बातें

किसी नई व्यावसायिक इकाई को शुरू करना जोखिम और पुरस्कार दोनों का संयोजन है।

बेशक एक नया उद्यम शुरू करना हमेशा जोखिम भरा कार्य है किन्तु प्रयत्न कर एक स्पष्ट योजना निर्धारित कर ली जाती है तो परियोजना के सफलता के अवसर बहुत अधिक बढ़ जाते हैं।

एक शक्तिशाली परियोजना रिपोर्ट बनाने के लिए यथा संभव भविष्य के रुझानों को वास्तविक स्वरूप में ही शामिल करना चाहिए।

भविष्य में व्यावसायिक इकाई को प्रोजेक्ट रिपोर्ट के आधार पर ही शुरू किया जाएगा इसलिए इसे बनाते समय सभी अप्रत्याशित खर्चों, मूल्यों की अधिकता, मुद्दों की उपेक्षा बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए।

व्यवसाय शुरू करने में आने वाली कठिनाइयों के समाधान ढूंढने के बाद ही प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की जानी चाहिए।

वित्त व्यवस्था स्थापना, संचालन उत्पाद या सेवा का निर्माण, विपणन से संबंधित सभी गणना सही तरीके से बिना गलती के करना चाहिए।

सम्पूर्ण सटीक जानकारी एकत्रित करते हुए, विभिन्न विकल्पों पर गहन अध्ययन के बाद ही प्रोजेक्ट रिपोर्ट के अन्तिम चित्र को दर्शाया जाना चाहिए।

प्रोजेक्ट रिपोर्ट कैसे बनाए

व्यावसायिक इकाई का चयन करने के बाद प्रस्तावित इकाई के सभी पहलुओं पर गंभीरता पूर्वक विचार करने के बाद ही प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनानी चाहिए।

इसके लिए निवेश के अवसरों को पहचानना, प्रारम्भिक विश्लेषण, व्यवहार्यता, मूल्यांकन, नियोजन आदि पर अध्ययन किया जाता है। छोटे उद्यमों की रिपोर्ट आप स्वयं भी बना सकते हैं।

जटिल एवं तकनीकी परियोजना के प्रतिवेदन बनाने के लिए आप बाजार में उपलब्ध विशेषज्ञों व संस्थाओं से सहयोग एव परामर्श ले सकते हैं। एक आदर्श प्रोजेक्ट रिपोर्ट में निम्न बिंदुओं पर विस्तृत जानकारी दिया जाना आवश्यक है।

1. सामान्य जानकारी

सबसे पहले उद्यमी का परिचय, प्रोजेक्ट के चयन एवं उसके औचित्य के संबंध में जानकारी लिखना चाहिए।

मालिक, भागीदार, प्रवर्तकों का संक्षिप्त परिचय, नाम, पता, आयु, शैक्षिक और व्यावसायिक योग्यता, उनकी वित्तीय स्थिति, अतीत का अनुभव, वर्तमान गतिविधि के बारे में बताना है।

प्रस्तावित व्यवसायिक इकाई को शुरू करने का कारण एवं औचित्य, कच्चा माल, मानव श्रम, बाजार की उपलब्धता, सरकारी सहायता, भविष्य की सम्भावनाएँ इन सभी पहलुओं पर जानकारी शामिल करना चाहिए।

2. प्रस्तावित इकाई की वैधानिक संरचना

इकाई के लिए वैधानिक संगठन संरचना और पैटर्न की जानकारी यहां देना चाहिए। यह बताएं कि इकाई एकल स्वामित्व, भागीदारी अथवा निजी सीमित कंपनी के रूप में कार्य करेगी।

इससे इकाई के कानूनी पहलुओं का अध्ययन किया जा सकता है।

3. प्रोजेक्ट का स्थान

इकाई के स्थान का चुनाव बहुत महत्वपूर्ण निर्णय होता है। चयनित स्थान का औचित्य स्पष्ट करना चाहिए।

भूमि सस्ती है, कच्चा माल, विद्युत, मानवीय श्रम सस्ता एवं पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। यातायात, संचार सुलभ एवं किफायती है।

पानी एवं जलवायु उद्यम अनुकूल हैं। सरकारी सहायता उपलब्ध है। इन सभी का विवरण दर्शाना चाहिए।

4. भूमि और भवन

भूमि एवं भवन उद्यमी के स्वयं के हैं। सरकारी आबंटन से प्राप्त है अथवा पट्टे पर लिए गए हैं। इसकी यथा स्थिति संपूर्ण जानकारी देना चाहिए।

केवल भूमि है, भवन है तो उद्योग अनुकूल है या फिर उसमें सुधार की जरूरत होगी।

भवन निर्माण किया जाना है तो कार्यशाला कच्चे माल तैयार माल के भंडारण का संपूर्ण नक्शा आवश्यक दस्तावेजों के विवरण सहित बताए जाने चाहिए।

लागत और क्षेत्र आदि की पूरी जानकारी सहित निर्माण योजना किसी अनुमोदित वास्तुकार द्वारा तैयार किए गए दस्तावेजी साक्ष्यों द्वारा मान्य होना चाहिए।

5. संयंत्र और मशीनरी का विवरण

उद्योग के लिए आवश्यक संयंत्र मशीनें उपकरण औजार से संबंधित समस्त जानकारी प्रदान करें। ये सभी नए अथवा पुराने खरीदे जाएंगे।

निर्माता कंपनी के ब्यौरे एवं गुणवत्ता की जानकारी सहित तीन अलग-अलग आपूर्तिकर्ताओं से कोटेशन या प्रोफार्मा इनवाइस के साथ समर्थित होना चाहिए।

इसमें करों के परिवहन, स्थापना के सामान आदि पर किए गए खर्च शामिल होने चाहिए।

स्पेअर पार्टस् एव मरम्मत आसानी से उपलब्ध है या नहीं इसका भी विवरण शामिल करना चाहिए।

6. विनिर्माण प्रक्रिया

प्रस्तावित उद्यम में कौन-कौन से उत्पाद अथवा सेवा निर्मित होंगे अथवा किए जाएंगे, उनकी कार्य विधि की जानकारी।

इकाई की विनिर्माण प्रक्रिया किस तरह की ली गई है। कच्चे माल से तैयार माल बनाने तक की संपूर्ण संचालन विधि, कार्य निष्पादन के तरीकों की सविस्तार जानकारी उनके औचित्य सहित बताना चाहिए।

इसमें व्यवसाय में आम तौर पर शामिल मान्यताओं और जोखिमों का उल्लेख अवश्य करना चाहिए।

7. कच्चा माल

उद्योग की सफलता के लिए कच्चा माल पर्याप्त मात्रा में सही मूल्य़ों पर हमेशा उपलब्ध होना जरूरी है।

इसकी व्यवस्था किस तरह की जाएगी जरुर स्पष्ट करना चाहिए।

इस संबंध में कौनसा कच्चा माल कहां से प्राप्त होगा। परिवहन मजदूरी कर पर कितना व्यय होगा।

आपूर्तिकर्ता द्वारा माल प्रदाय एवं भुगतान की क्या शर्तें हैं ।

कच्चा माल और उपभोग्य सामग्रियों की वार्षिक जरूरतों का विवरण, कोटेशन के साथ भी समर्थित होना चाहिए।

आपूर्ति में बाधाओं से निपटने के लिए कच्चे माल का सुरक्षात्मक भंडारण स्तर पर भी जानकारी प्रस्तुत करना चाहिए।

8. तकनीकी जानकारी एवं अनुभव

यदि प्रस्तावित व्यवसायिक इकाई आधुनिक तकनीक पर आधारित है तो ऐसी स्थिति में खुद उद्यमी को कितनी तकनीकी जानकारी एवं अनुभव है यह बताना चाहिए।

यदि उक्त के संबंध में प्रशिक्षण लिया जाना है तो स्त्रोत एवं उसकी विश्वसनीयता का विवरण देना उचित होगा।

यदि यह कार्य प्रशिक्षित एवं कुशल कर्मचारियों द्वारा करवाने की योजना है तो इसका उल्लेख करना चाहिए।

9. प्रबंधन क्षमता

उद्यमी प्रस्तावित इकाई की प्रबंध व्यवस्था स्वयं सँभालने हेतु सक्षम है उसमें टीम का नेतृत्व करने की क्षमता है।

इससे संबंधित सभी प्रमाणिक जानकारी देनी चाहिए।

व्यवसाय प्रबंधन का तरीका, कर्मियों को काम पर रखने और प्रशिक्षण देने का कार्यक्रम और प्रबंधन की नीतियां स्पष्ट करना चाहिए।

10. कुशल एवं अकुशल कर्मचारियों की उपलब्धता:

इकाई के संचालन हेतु आवश्यक कुशल एवं अकुशल श्रमिक आवश्यकता अनुसार किस तरह उपलब्धता होंगे उनको किस तरह प्रशिक्षित किया जाएगा इसके संबंध में जानकारी देना उचित होता है।

11. मांग एवं पूर्ति की स्थिति

मार्केट सर्वे के दौरान बाजार की स्थिति के संबंध किए गए अध्ययन एव प्राप्त सूचना को यहां शामिल किया जाना चाहिए।

प्रस्तावित इकाई द्वारा उत्पादित उत्पाद की बाजार में मांग एवं आपूर्ति की जानकारी, मार्केट सर्वेक्षण के आधार पर कुल वर्तमान मांग के विरुद्ध आपूर्ति की स्थिति, भविष्य में मांग के घटने अथवा बढ़ने की संभावना आदि की जानकारी का यहां उल्लेख करना चाहिए।

12. मार्केटिंग प्रबंधन

उत्पाद अथवा सेवा की मार्केटिंग की व्यवस्था किस तरह की जाएगी। किस तरह माल का वितरण किया जाएगा। अनुमानित खरीददार उनकी वार्षिक अनुमानित आवश्यकता क्या है।

उत्पाद को बाजार में किस मूल्य पर बेचा जा सकता है। बाजार मे अन्य इकाइयों द्वारा किस दर पर किस शर्त पर प्रदाय की जा रही है, आदि जानकारी देना चाहिए।

13. समविच्छेद बिंदु का विश्लेषण

प्रोजेक्ट रिपोर्ट में सम विच्छेद बिंदु का विवरण प्रस्तुत करना चाहिए। यह आय व्यय का वह स्तर है जहां उद्यम का कुल खर्चा और कुल आय। बराबर हो जाते हैं।

इस आय व्यय समतुल्ता स्तर से पता चलता है कि इकाई कब तक घाटे में रहेगी एवं कब से लाभ प्राप्ति होगी

प्रोजेक्ट रिपोर्ट में निम्न विवरण भी संलग्न होने चाहिए जिससे प्रोजेक्ट की आर्थिक व्यवहार्यता तथा ऋण की आवश्यकता का पता लगाया जा सके।

(i). प्रोजेक्ट की कुल लागत –

 योजना आयोग के निर्देशों अनुसार परियोजना की लागत को निम्न मुख्य शीर्षक अनुसार दिखाया जाना चाहिए। ये शीर्षक हैं

मदराशि
(i). भवन और सिविल कार्य (निर्माण विद्युतीकरण सहित)
(ii). मशीनें एवं संयंत्र जीएसटी ढुलाई समस्त व्यय सहित)
(iii). भूमि और स्थान विकास
(iv). निश्चित परिसंपत्तियाँ
(v). प्रारंभिक और परिचालन व्यय
(vi). तकनीकी विशेषज्ञ
(vii). कार्यशील पूंजी
(viii). अन्य आकस्मिकताओं हेतु मार्जिन मनी
प्रोजेक्ट की कुल लागत

(ii). वित्तीय संसाधन

प्रोजेक्ट रिपोर्ट में उद्यमी को कुल प्रोजेक्ट लागत के साथ अपने सभी वित्त के स्त्रोत भी दर्शाने चाहिए। इससे यह पता लगाने में सुविधा होगी कि वह कुल लागत किन स्त्रोतों से पूरी करेगा।

स्त्रोतराशि
1. पूँजी से
2. बैंक एवं वित्तीय संस्थानों से ऋण
3. मित्रों / रिश्तेदारों से प्राप्त जमा
4. बाजार से उधार प्राप्ति द्वारा
5. बैंकों द्वारा कार्यशील पूँजी हेतु ऋण
6. अन्य स्त्रोतों से
(सरकारी अनुदान)
कुल योग

कुल लागत तथा कुल वित्तीय स्त्रोतों का योगफल बराबर होना चाहिए।

(iii). गर्यकारी परिणामों का आर्थिक विवरण

इसके अंतर्गत आगामी तीन वर्षों का वार्षिक उत्पादन समस्त व्यय आय शुद्ध लाभ ऋण पुनर्भुगतान आवरण अनुपात (DSCR) संबंधी जानकारी दी जानी है।

इससे यह पता चलता है कि इकाई प्रति वर्ष कितना लाभ कमाएगी। बैंक द्वारा दिए ऋण को चुका सकेगी अथवा नहीं। इसके लिए परियोजना प्रतिवेदन में तीन वर्षों का अनुमानित स्थिति विवरण भी संलग्न करना होगा।

छोटे ऋणों के लिए बैंक द्वारा फंड प्रवाह एवं नक़द प्रवाह का विवरण नहीं मांगा जाता। परंतु बड़े ऋणों के लिए इन्हें भी संलग्न करना होता है। लाभप्रदता की गणना इस तरह की जाएंगी।

(iv). अनुमानित लाभप्रदता विवरण

 प्रथम वर्षद्वितीय वर्षतृतीय वर्ष
इकाई की उत्पादन क्षमता मात्रा
वास्तविक उत्पादन मात्रा
उत्पादन क्षमता के विरुद्ध
वास्तविक उत्पादन का %
(अ). उत्पाद की बिक्री से कुल
प्राप्ति प्रति इकाई कीमत
उत्पादन व्यय: 
1. कच्चा माल
2. स्टोर एवं स्पेअर्स
3. जल विद्युत ईंधन आदि
4. वेतन एवं मजदूरी
5. रखरखाव एवं मरम्मत
6. किराया बीमा आदि
7. मूलह्यस
8. अन्य व्यय
(ब). कुल उत्पादन व्यय

बिंदु 1 से 8 का योगफल                   –       –       –

9. प्रशासनिक व्यय भ्रमण स्टेशनरी

छपाई डाक व्यय।                            –        –        –

10. विक्रय पर व्यय डिस्काउंट

रिबेट प्रचार व्यय।                            –       –        –

(स). कुल प्रशासनिक बिक्री व्यय

बिंदु 9 से 10 का योगफल                –       –        –

11.बैंक ऋण पर देय ब्याज।              –       –       –

12. अन्य स्त्रोतों से प्राप्त सावधि

ऋण पर देय व्याज                           –       –       –

(द). कुल वित्तीय व्यय

बिंदु 11एवं 12 का योगफल।             –      –        –

(i). उत्पादन संबंधित कुल व्यय

(ब+स+द।  )                          –      –       –

(ii). कुल लाभ  (अ- क)                    –      –       –

(iii). शुद्ध लाभ  (ख- कुल लाभ पर देय आयकर)

(iv). शुद्ध बचत  (ग+7)

विक्रय पर प्राप्त होने वाले लाभ की मात्रा काफी अच्छी होनी चाहिए। यदि यह अनुपात बहुत कम है, तो उपक्रम की प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति बहुत कम हो जायेगी।तथा लागत बढ़ने अथवा कीमत में कमी के कारण उपक्रम की प्रतिरोध शक्ति घट जायेगी।

14. आर्थिक व्यवहार्यता

ब्रेक इवन प्वाइंट तथा अर्जित अनुमानित शुद्ध लाभ के विष्लेषण से से इस बात का पता लगाया जा सकता है, कि उद्यमी ब्याज सहित ऋण की किस्तें चुकाने के बाद अपने लिए आवश्यक धनराशि बचा सकता है।

यह भी पता लगाया जा सकता है कि उद्यमी लगाई गई पूंजी पर कितने प्रतिशत लाभ कमा सकता है। सम-विच्छेद बिन्दु का प्रदर्शन संयन्त्र क्षमता के सन्दर्भ में किया जाना चाहिए।

इसके आधार पर अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए स्थायी लागतों अथवा परिवर्तनशील लागतों को कम करने की योजना बनाई जा सकती है।

इसकी गणना इस प्रकार की जाती है।

बीईपी = (निश्चित लागत * उच्चतम क्षमता का % उपयोग) * 100 / योगदान

योगदान = बिक्री – परिवर्तनीय लागत

यह वर्ष के लिए गणना की जाती है जिसके दौरान इकाई उच्चतम क्षमता उपयोग तक पहुंचती है। लघु उद्योग परियोजनाओं के लिये बीईपी की आदर्श स्थिति 30 से 50 प्रतिशत के बीच होती है।

ज्यादा ऊँचा सम-विच्छेद बिन्दु सुरक्षा सीमा (Safety Margin) को कम कर देता है तथा उत्पादन एवं विक्रय स्तर पर होने वाले बदलावों से उपक्रम प्रभावित होता है।

पूँजी पर रिटर्न की शुद्ध दर

इकाई में लगाई गई पूँजी पर रिटर्न की शुद्ध दर उचित एवं पूँजी बाजार में उपलब्ध ब्याज दर से ऊँची होनी चाहिए।

ताकि उद्यमी को उसके प्रयासों एवं जोखिम उठाने के लिये पर्याप्त प्रत्याय प्राप्त हो सके।

इस तरह प्रोजेक्ट रिपोर्ट के आधार पर बैंक को प्रस्तावित इकाई को ऋण स्वीकृत करने में भी मदद मिलेगी।

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सारांश :

इस प्रकार प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाते समय इन बिन्दुओं पर जानकारी दी जानी चाहिए। प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाते समय हर प्रोजेक्ट रिपोर्ट में यही क्रमबद्धता जरूरी नहीं है।

यह आपकी समझदारी पर निर्भर करता है प्रोजेक्ट रिपोर्ट का प्रारूप आप अपने प्रोजेक्ट की आवश्यकता के अनुसार बदल भी सकते हैं।

प्रोजेक्ट रिपोर्ट के संबंध में आपको कुछ पूछना है तो आप कमेंट्स कर पूछ सकते हैं। आपके कमेन्ट्स का इंतजार रहेगा। फिर मिलते हैं ऐसे ही एक महत्वपूर्ण टापिक के साथ।

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