“व्यवसाय संरचना” क्या है? अपने लिए सही व्यवसाय संरचना कैसे चुनें ।

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व्यवसाय संरचना क्या है? “व्यवसाय संरचना”क्या है? अपने लिए सही व्यवसाय संरचना कैसे चुनें ।

बिजनेस शुरू करने के लिए आपको यह समझना  जरूरी है कि व्यवसाय संरचना क्या है? अपने लिए सही व्यवसाय संरचना कैसे चुनें।

 अपने बिजनेस के लिए परफेक्ट “व्यवसाय संरचना” निर्धारित करना सबसे अधिक महत्वपूर्ण काम है

क्योंकि “व्यवसाय संरचना” के आधार पर ही आपके
व्यवसाय पर आयकर एवं अन्य कर लगाए जाएंगे।

इसी के आधार आप अपना बिजनेस संचालित कर सकेंगे। एवं सफलता प्राप्त करने के लिए रणनीति बना पाएंगे।

इसके लिए आपको इन मुद्दों पर जरूर विचार करना चाहिए। बिजनेस के लक्ष्य और उद्देश्य क्या हैं?

कितने प्रारंभिक निवेश की जरूरत होगी। इसकी व्यवस्था किस तरह से की जावेगी।

बिजनेस का आकर एवं कार्यक्षेत्र क्या होगा ? उसमेंं कितने लोग कार्य करेंगे? व्यवसाय की अवधि क्या है?(अल्पावधि/दीर्घकालिक)

कराधान पद्धति, वैधानिक औपचारिकताएं, नियम कानून अनुपालन का भार, एवं लाभ विभाजन आदि।

आप  यदि विभिन्न व्यवसाय संरचनाओं में से अपने बिजनेस के लिए एक स्पष्ट विकल्प चुनने में असमर्थ हैं,

तो हमारा यह लेख बतौर एक व्यावसायिक सलाहकार आपका मार्गदर्शन करेगा।

आपके व्यवसाय को सही “व्यवसाय संरचना” पंजीयन करने के लिए अंतर्दृष्टि प्रदान करेगा।

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परन्तु हम अनावश्यक या एक ही चीज को बार बार दुहराते हुए लेख को बड़ा करने की कोशिश कभी नहीं करते हैं।

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इसलिये “व्यवसाय संरचना”  का स्वरूप निर्धारित करना लेख को ध्यानपूर्वक पूरा अवश्य पढ़ें।

आप चाहें तो इसे दो या तीन पार्ट में भी पढ़ सकते हैं। इसके लिए इसे बुकमार्क करके भी रख सकते हैं।

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अपनी “व्यवसाय संरचना” का स्वरूप निर्धारित करने का निर्णय खुद की योग्यता, नियंत्रण क्षमता, मौजूद संसाधन भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर लेना चाहिए।

कोई “व्यवसायिक संरचना” किसी बिजनेस के लिए सबसे बेहतरीन है या सबसे बेकार ऐसा कोई मापदंड नहीं हो सकता है।

सभी व्यवसायिक संरचनाओं के अपने अपने फायदे और नुकसान हैं।

व्यवसायी को अपने बिजनेस की जरूरतों के अनुसार महत्वपूर्ण घटकों को प्राथमिकता देते हुए सबसे अधिक उपयुक्त “व्यवसाय संरचना “का चयन करना चाहिए।

वैधानिक दृष्टि से व्यवसायिक संरचनाओं को दो मुख्य भागों में बांटा जाता हैं। निगमित निकाय एव अनिगमित निकाय।

1. निगमित निकाय:

ऐसे निकाय एवं संंस्थान जिन्हें विधान द्वारा बनाई गई प्रक्रिया से वैधानिक एवं सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पंजीकृत किया गया है।

इनका संचालन निर्मित वैधानिक प्रावधानों के अनुसार  ही किया जाता है।

इनका उद्देश्य व्यक्तिगत हितों को ना देखते हुए सामूहिक विकास के लिए काम करना होता है।

2.अनिगमित निकाय :

ऐसे  सभी निकाय या संस्थान जिनका पंजीयन वैधानिक प्रावधानों के अनुसार निर्मित प्रक्रिया  द्वारा नहीं कराया गया है।

इन संरचनाओं का उद्देश्य सामाजिक एवं सामूहिक नहीं होता। ये व्यक्तिगत लाभ के लिए निर्मित की जाती हैं।

इस प्रकार की व्यवसायिक संरचना कुछ व्यक्तियों द्वारा अपने स्वयं के व्यक्तिगत लाभ एवं विकास के लिए की जाती है।

अनिगमित निकाय की श्रेणी में एकल स्वामित्व, जनरल भागीदारी एवंं संयुक्त हिंदू परिवार ये व्यवसायिक संरचना संमिलित हैं जो इस प्रकार हैं।

एकल स्वामित्व व्यवसाय

सोल प्रोप्राइटरशिप

(Sole Propritership)

 

यह व्यवसाय संरचना का सबसे  सरल, प्रचलित एवं सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला स्वरूप है।

इसे एक-व्यक्ति व्यवसाय, एकल स्वामित्व व्यापारी फर्म सोल प्रोप्राइटरशिप आदि नामों से भी जाना जाता है।

आप न्युनतम निवेश पर बहुत कम जोखिम के साथ शुरू इसे शुरू कर  सकते हैं।

कोई भी व्यवसायी इसे खुद के नाम से अथवा अन्य किसी भी नाम से स्थापित कर सकता है।

अकेले व्यवसायी को बिजनेस में पूंजी लगाना है, उसे ही कारोबार का संचालन एवं नियंत्रण करना है। एवं होने वाले समस्त लाभ-हानि को वहन भी करना है।

वह आवश्यकता अनुसार दूसरों को अपनी मदद  के लिए काम पर रख सकता है।

प्रोपराइटरशिप बिजनेस के लिए किसी पंजीयन की जरूरत नहीं है। उद्यम के गठन को दर्शाने के लिए कोई कागजी कार्रवाही नहीं करना है।

केवल व्यवसाय की प्रकृति अनुसार जरूरी लायसेंस एवं अनुमति लेना होता है।

उदाहरण के लिए दुकान या शोरूम खोल रहे हैं तो दुकान एवं स्थापना तथा जीएसटी पंजीयन करवाना चाहिए।

खाद्य सामग्री का व्यापार निर्माण खरीदी विक्रय करने जा रहे हैं, तो fssai प्रमाण पत्र लेना चाहिए।

प्रोपराइटरशिप व्यवसाय संरचना का अलग से कोई कानूनी अस्तित्व नहीं होता है।

मालिक और बिजनेस अलग अलग नहीं हैं। इसलिए दोहरे कराधान की जरूरत नहीं होती है।

इस संरचना में हिसाब-किताब रखना अनिवार्य नहीं है।
परंतु लेखा प्रयोजनों के लिए यह एक अलग इकाई है।

इसलिए व्यवसाय से संबंधित वित्तीय गतिविधियों को निजी वित्तीय गतिविधियों से अलग ही रखना चाहिए।

व्यापार स्वामी की मृत्यु पर  स्वतः समाप्त हो जाता है।

प्रोपराइटरशिप ऐसे एकल कारोबारी के लिए उपयुक्त है, जो अनौपचारिक तरीके से बिजनेस शुरू करना चाहता है।

गठन के लिए आपके पास निम्नलिखित दस्तावेज होना चाहिए।

आपका आधार कार्ड, पैन कार्ड, बैंक में चालू खाता, पंजीकृत कार्यालय प्रमाण (किरायानामा या उपयोगिता बिल)

यह व्यवसाय संरचना स्थानीय और सीमित बाजारों के लिए ज्यादा अनुकूल है।

कृषि, खुदरा व्यापार, पेशेवर लोगों, सेवा प्रदाता के लिए यह अधिक मददगार हो सकती है, क्योंकि यहां ग्राहको पर व्यक्तिगत ध्यान देना जरूरी होता है।

एकल स्वामित्व व्यवसाय संरचना ऐसे उद्यमियों के लिए बढ़िया हो सकती है, जो स्वतंत्र रूप से अपना काम करना चाहते हैं।

जो अपने कौशल को दूसरों से साझा नहीं करना चाहते।
किसी दूसरे के साथ साझेदारी करना पसंद नहीं करते हैं।

किसी सार्वजनिक कंपनी में काम नहीं करना चाहते हैं।
जो लाभ मिल रह है उसी में खुश रहते हैं।

एकल व्यवसाय की सफलता पूरी तरह उसके स्वामी के कार्यकौशल एवं कार्यक्षमता पर ही निर्भर होती है।

सभी लेनदारों को भुगतान करने के लिए प्रोप्राइटर का दायित्व असीमित होता है।

बिजनेस में बड़ा घाटा होने पर बिजनेस की संपत्ति के अतिरिक्त उसकी निजी संपत्ति भी बेची जा सकती है।

इन फर्मों की संपत्ति एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को सरलता से बेची जा सकती हैं।

आपके पास पूंजी हेतु धन तथा बिजनेस की जानकारी है, तो आप प्रोप्राइटरशिप बिजनेस शुरू कर सकते हैं। एक नाम रखें एवं अपना एकल स्वामित्व बिजनेस शुरू करें।

एकल स्वामित्व व्यवसाय के गुण। 

एकल स्वामित्व व्यवसाय बहुत छोटे स्तर पर बहुत कम पूंजी एवं कम जोखिम से शुरू किया जा सकता है।

इसका मुख्य लाभ यह है कि इसे किसी भी सरकारी पंजीकरण की आवश्यकता नहीं होती है। बहुत कम सरकारी अनुपालन करना पड़ता है।

एक ही व्यक्ति का संपूर्ण नियंत्रण होने के कारण समय और सामग्री की बरबादी नहीं हो पाती। इससे लागत कम आती है अधिक लाभ कमाया जा सकता है।

सब काम एक ही व्यक्ति द्वारा किए जाते हैं इसलिए सभी ग्राहकों पर पूरा ध्यान दिया जा सकता है।

इससे हर ग्राहक व्यवसायी से संतुष्ट रहता है।शिकायत नहीं होने से व्यवसाय की अधिक उन्नति होती है।

एकल व्यवसाय का स्वरूप छोटा होने से ओवरहेड व्यय भी कम होते हैं। इससे कम खर्च मे कार्य हो सकते है।

प्रोप्राइटरशिप में अकेला व्यक्ति अपना खुद का ‘बॉस’ होता है। वह काम करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्रत होता है। वह अपनी मनमर्जी अनुसार काम कर सकता है।

यह व्यवसाय संरघना केवल एक ही व्यक्ति से संबंधित है। इसलिए इसे भंग करना भी आसान है।

संतोषजनक परिणाम प्राप्त नहीं होने की दशा में अथवा अन्य किसी भी परिस्थिति में इसका सरलता पूर्वक कभी भी विघटन किया जा सकता है।

एकल स्वामित्व व्यवसाय की कमियां।

इस प्रकार के व्यावसायिक संगठन की मुख्य कमियाँ इस प्रकार हैं।

एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को स्वामित्व हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है।

उधारदाता उधार देने के लिए कम तैयार होते हैं, क्योंकि व्यवसाय एक व्यक्ति के हाथों में होने के कारण जोखिम अधिक रहता है।

इसमें व्यवसाय तथा स्वामी का अस्तित्व अलग अलग नहीं होता। यही इस स्वरूप की सबसे बड़ी कमजोरी है।

इसलिए यह संरचना विकास के लिए अनुकूल नहीं है।

इसे ओपीसी, साझेदारी से जोड़ा नहीं  जा सकता है। एवं ना ही एलएलपी / कंपनी में परिवर्तित किया जा सकता है।

अकेले व्यक्ति पर पूरे काम का जिम्मा होने से काम की गुणवत्ता में कमी भी आ सकती है।

एकल व्यवसाय सीमित साधनों से संचालित होता है।  इसलिए हमेशा सीमित लाभ ही दे सकता है।

सीमित संसाधनों के कारण बड़े व्यवसायिक संस्थानों से प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं कर सकता है ।

एक ऐसा समय आता है जब एकल स्वामित्व व्यवसायी उस स्थिति में पहुंच जाता है, जब वह अपने बिजनेस को अकेला आगे नहीं बढ़ा सकता है।

इस स्थिति में उसे अपने बिजनेस को आगे जारी रखने के लिए के लिए युवा व्यक्ति के साथ भागीदारी व्यवसाय विकसित कर लेना चाहिए।

 साझेदारी (भागीदारी) पार्टनरशिप
(Partnership Firm)

साझेदारी (भागीदारी) यह व्यवसाय संरचना भारतीय भागीदारी अधिनियम द्वारा शासित होती है।

सामूहिक रूपसे, लाभ कमाने के लिए,आपसी विश्वास पर कुछ समझदार एवं अनुभवी व्यक्तियों द्वारा, गठित संगठन को भागीदारी फर्म कहते हैं ।

दो या दो से अधिक,अधिकतम 20 व्यक्ति मिलकर साझेदारी व्यवसाय स्थापित कर सकते हैं।

अनुबंध करने के लिए कानूनी तौर पर सक्षम व्यक्ति ही साझेदार बन सकते हैं।

सभी व्यक्ति आपस में भागीदार, पार्टनर साझेदार कहलाते हैं।

सभी पार्टनर आपसी सहमति से एक साझेदारी विलेख (पार्टनरशिप डीड) का मसौदा तैयार करते हैं।

जिस पर सभी साझेदार हस्ताक्षर करते हैं। इसका अर्थ साझेदारी फर्म का गठन किया गया है।

इस विलेख में स्पष्ट रूप से फर्म एवं भागीदारों के नाम, पते, व्यवसाय का विवरण, प्रत्येक साझेदार के दायित्व, कर्तव्य, अधिकारों एवं शक्तियों को दर्शाया जाता है।

इस मसौदे में यह भी तय किया जाता है कि प्रत्येक साझेदार बिजनेस में कितना धन या संपत्ति लगाएगा।

प्रत्येक साझेदार क्या काम करेगा। एवं सभी साझेदार कितने प्रतिशत तक लाभ-हानि को साझा करेंगे।

भागीदारों में से किसी एक को प्रबंध भागीदार भी नियुक्त किया जा सकता है।

भागीदारों को वेतन और अन्य भुगतानों के विवरण भी विलेख में उल्लिखित किए जाते हैं।

इस विलेख में व्यवसाय की आवश्यकता अनुसार अन्य प्रासंगिक विवरण भी शामिल किए जा सकते हैं।

साझेदारी फर्म के नाम पर संपत्ति खरीदी जा सकती है।  इन परिसंपत्तियों के मालिक फर्म के भागीदार ही होते हैं।

साझेदारी व्यवसाय शुरु करने के लिए सरकारी अनुमति की जरूरत नहीं होती है।

साझेदारी व्यवसाय संरचना का अपना स्वयं का कानूनी अस्तित्व नहीं होता है।

मगर साझेदारी फर्म के लिए एक अलग स्थायी खाता संख्या (PAN) आबंटित किया जाता है।

व्यवसायिक ऋणों में प्रत्येक साझेदार का व्यक्तिगत  दायित्व असीमित होता है।

किसी साझेदार के दिवालिया पागल या  मृत्यु होने पर साझेदारी भंग भी हो सकती है।

साझेदारी विलेख का रजिस्ट्रार ऑफ फर्म (आरओएफ) से पंजीयन करवाया जा सकता है। पंजीयन नहीं होने पर इसे कानूनी दस्तावेज नहीं माना जाता है।

आपस में मतभेद की स्थिति में पंंजीयत साझेदारी डीड भागीदारों को कुछ कानूनी सुरक्षा प्रदान कर सकती है।

साझेदारी फर्म के लिए लेखा परीक्षा में वार्षिक रिटर्न जमा करने की आवश्यकता नहीं होती है

साझेदारी व्यवसाय संरचना मध्यम व्यवसाय के लिए उपयोगी हो सकती है।

साझेदारी व्यवसाय के गुण :

1. इसमें एकल स्वामित्व की अपेक्षा व्यवसाय के लिए अधिक पूंजी की व्यवस्था हो जाती है।

2. एक से अधिक व्यक्तियों का असीमित दायित्व होने के कारण ऋण प्राप्त करना भी आसान हो जाता है।

3. दो से ज्यादा व्यक्ति मिलकर बिजनेस करते हैं, जिससे बिजनेस के सफल संचालन के लिए एक से अधिक प्रतिभाशाली एवं क्षमतावान व्यक्ति उपलब्ध रहते हैं।

4. बिजनेस का पूरा भार एक व्यक्ति पर नहीं होता। समस्त कार्य साझदारों में आपस में बांट लिए जाते हैं।

5. किसी एक व्यक्ति के असमर्थ होने पर भी व्यवसाय  निर्बाध चलता रहता है।

6. कोई भी समस्या का निर्णय लेने के लिए एक से अधिक व्यक्ति उपलब्ध रहते हैं। इससे सटीक निर्णय लिए जाते हैं। चूक के अवसर कम हो जाते हैं।

7. हानि का जोखिम आपस में बंटकर कम हो जाता है।

साझेदारी व्यवसाय की कमियां :

किसी भी एक भागीदार से विवाद की स्थिति बनने पर  वह पूरी भागीदारी फर्म को कानूनन बंद करवा सकता है।

एक व्यक्ति की लापरवाही के परिणाम के लिए सभी साझेदार उत्तरदायी होते हैं।

असीमित दायित्व होने के कारण सभी भागीदार बड़ी जोखिम उठाना पसंद नहीं करते। इसका सीधा असर बिजनेस पर पड़ता है।

भागीदार के रिटायरमेंट, मौत, दिवालियेपन या पागलपन की स्थिति में साझेदारी को भंग करना पड़ता है। इससे   साझेदारी फर्म में स्थायित्व की कमी होती है।

भागीदारों का उत्तरदायित्व असीमित होता है।अधिक संपन्न व धनी भागीदार को ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए वे भागीदारी के लिए तैयार नहीं होते।

भागीदारी में भारी हानि होने पर लेनदार मजबूत आर्थिक स्थिति वाले पार्टनर से ही पूरी वसूली करना चाहते हैं। भले ही वह न्युनतम लाभ प्राप्त कर रहा था।

साझेदारी की सफलता कानून से ज्यादा आपसी समझ विश्वास और इमानदारी पर निर्भर होती है ।

इसलिये भागीदारी व्यवसाय एक ही परिवार के सदस्यों या बहुत खास मित्रों के साथ शुरू किए जाते हैं।

आप पूंजी, साहस,आत्मविश्वास या किसी अन्य कमी के कारण अपना बिजनेस शुरू करने में असमर्थ हैं,

तो आप अन्य योग्य एवं भरोसेमंद व्यक्तियों को भागीदार बनाकर साझेदारी व्यवसाय शुरू कर सकते हैं।

संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय (Joint Hindu Family Business)(एचयूएफ)

संयुक्त हिंदू परिवार इस व्यवसाय संरचना को शुरू करने के लिए परिवार में कम से कम दो सदस्य होना चाहिए।

इसी के साथ यह भी जरूरी है कि पैत्रक संपत्ति परिवार को विरासत में प्राप्त हुई हो ।

यह व्यवसायिक संरचना केवल भारत में प्रचलन में है। यह हिन्दू कानून से शासित होती है।

इसके लिए अधिनियम में किसी भी प्रकार का कोई अलग से विशेष प्रावधान नहीं है।

हिंदू अनडिवाइडेड फेमिली (एचयूएफ) व्यवसाय को आयकर में विषेश छूट का लाभ प्राप्त होता है।

उसे प्रतिवर्ष आयकर रिटर्न दाखिल करना जरूरी होता है।

संयुक्त हिन्दू परिवार भारत का निवासी या अनिवासी भी हो सकता है। इसी आधार पर उसका नियंत्रण होता है।

इस  व्यवसाय संरचना में परिवार का सबसे अधिक उम्र वाला व्यक्ति ही इसका प्रमुख होता है। उसे कर्ता कहते हैं।

संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय का स्वामित्व, प्रबंधन एवं नियंत्रण सदैव कर्ता के ही पास रहता है।

कर्ता की मृत्यु हो जाने पर व्यवसाय भंग नहीं होता। जारी रहता है। परिवार का अगला सबसे बड़े सदस्य कर्ता बन जाता है।

हालांकि, आपसी सहमति से सदस्य व्यवसाय को समाप्त भी कर सकते हैं।

इस परिवार में जन्म लेने वाले शिशु व्यवसाय के सदस्य बन जाते हैं। इसलिए, नाबालिग भी व्यवसाय के सदस्य हो सकते हैं।

एक ही परिवार के सदस्यों के रहने से आपसी निष्ठा एवं सहयोग में वृद्धि होती है।

कर्ता के प्रबंध कौशल पर व्यवसाय की सफलता निर्भर रहती है। यदि कर्ता प्रभावी निर्णय नहीं ले सकता है तो व्यवसाय को नुकसान भी हो सकता है।

संयुक्त हिंदू परिवार के कर्ता की देयता असीमित होती है। सदस्यों की देयता व्यवसाय की संपत्ति में उनके हिस्से की सीमा तक सीमित होती है।

अभी तक आप अनिगमित व्यवसाय संरचनाओं की  जानकारी प्राप्त कर रहे थे। अब हम निगमित व्यवसाय संरचनाओं के संबंध चर्चा करेंगे।

सहकारी संस्थान

को- आपरेटिव सोसाइटी (Cooperative

Societies)

को-आपरेटिव सोसाइटी व्यक्तियों का एक स्वैच्छिक संघ है, जो आपसी कल्याण के उद्देश्य से एकसाथ आते हैं।

एक ही वर्ग विशेष के कुछ व्यक्ति मिलकर किसी समान एवं पारस्परिक लाभ के लिए स्वेच्छा से एक संस्था की स्थापना करते है तो उसे सहकारी समिति कहते हैं।

को-ऑपरेटिव सोसायटी के कुशल संचालन के लिए भारतीय को ऑपरेटिव सोसायटी अधिनियम 1912  लागू किया गया था।

जिसमें समय समय पर जरूरत अनुसार संशोधन किए जाते रहे हैं।

सहकारी सोसायटी इसमें वर्णित वैधानिक प्रक्रिया के अनुसार स्थापित एवं संचालित होती है।

सहकारी संस्थान कि स्थापना के लिए सात सदस्य होना जरूरी है। भले ही वे पूर्णकालिक कर्मचारी ना हों।

यह व्यवसाय संरचना एक स्वैच्छिक संघ है, इसलिए इसकी सदस्यता भी स्वैच्छिक ही  होती है।

कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा अनुसार सहकारी समिति में शामिल होने एवंं छोड़ने के लिए स्वतंत्र है, वह कभी भी शामिल हो सकता है अथवा छोड़ सकता है।

इसलिए सहकारी समिति अपने सदस्यों के प्रवेश या निकास से प्रभावित नहीं होती है। इसमें सभी सदस्य समान होते है।

यह आपसी समानता, पारस्परिक सहायता और कल्याण के सिद्धांत पर काम करती है।

इसकी मुख्य विशेषता इसके मालिक ही इसके कर्मचारी होते हैं।

व्यवसाय के लिए धन की व्यवस्था इन्हीं लोगों के द्वारा की जाती है। तथा इनका उत्तरदायित्व भी सीमित ही होता है।

सहकारी समिति के सदस्यों की देयता पूंजी के रूप में उनके द्वारा योगदान की गई राशि तक ही सीमित होती है।

सदस्यों को मतदान का अधिकार होता है, जिसके द्वारा वे उन सदस्यों का चुनाव करते हैं जो प्रबंध समिति का गठन करेंगे।

निर्वाचित प्रबंध समिति के पास सभी निर्णय लेने की शक्तियाँ होती हैं।

को-आपरेटिव सोसायटी का प्रथम उद्देश्य अपने सदस्यों को सेवा प्रदान करना है।

लाभ को वरीयता ना देते हुए अपने सदस्यों को उन्हें आवश्यक सुविधाएँ एवं सहायता उपलब्ध कराना है।

सहकारिता के इस रूप में, श्रमिक अपने स्वयं के स्वामी हैं। व्यवसाय उनके स्वामित्व में है।

वे ही प्रबंधकों और फोरमैन का चुनाव करते हैं। वे अपने ही कर्मचारी होते हैं।

अर्जित लाभ, कुछ व्यक्तियों को समृद्ध करने के बजाय, वास्तविक श्रमिकों के पास ही जाता है ।

इसका स्वामित्व सामूहिक रूप से होने पर अन्य बड़ी व्यापारिक संस्थाओं द्वारा इसका शोषण नहीं किया जा सकता है।

सहकारी समिति का पंजीकरण करवाना अनिवार्य है। यह समाज के लिए एक अलग कानूनी पहचान है।

इन्हें भी वार्षिक लेखा दाखिल कराना अनिवार्य होता है।

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के व्यक्ति सहकारी संस्थानों की स्थापना कर सकते हैं। तथा सरलता से अपना व्यवसाय प्रारंभ कर सकते हैं।

एक व्यक्ति कंपनी
वन परसन कंपनी(ओपीसी)
(One Person Company)

वर्ष 2013 में भारत सरकार द्वारा वन पर्सन कंपनी (ओपीसी) नामक एक नए प्रकार की व्यवसाय संरचना लागू की गई। है

इस व्यवसाय संरचना का उद्देश्य देश में बिजनेस को बढ़ावा देना तथा एकल स्वामित्व मे स्वामी के असीमित
दायित्व की जोखिम को कम करना है।

यह कंपनी अधिनियम, 2013 अनुसार शाषित होती है।  ओपीसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी और एकल स्वामित्व का एक संकरित स्वरूप है।

इसमें निदेशक मंडल की आवश्यकता नहीं होती है।

केवल एक ही व्यक्ति निदेशक के साथ-साथ कंपनी के शेयरधारक के रूप में भी कार्य करता है।

ओपीसी में एक से अधिक निदेशक भी नियुक्त किए जा सकते हैं।

कंपनी में एक से अधिक निदेशक होने पर साल में दो बार मीटिंग (बैठकें) करना जरूरी होता है।

निदेशकों की कुल संख्या 15 से अधिक नहीं हो सकती है। ओपीसी में सीमित देयता होती है।

एक व्यक्ति कंपनी में अन्य कंपनियों की अपेक्षा कम वार्षिक अनुपालन करने होते हैं।

शेयरहोल्डर अपने बाद किसी व्यक्ति को उत्तराधिकारी भी नामांकित कर सकता है ।

जो मृत्यु या अन्य स्थिति में उस कम्पनी का शेयरहोल्डर बन जाता है।

कोई व्यक्ति एक से अधिक ओपीसी नहीं बना सकता। एवं एक से अधिक ओपीसी में नामांकित व्यक्ति भी नहीं बन सकता है।

नॉमिनी को अपनी लिखित सहमति रजिस्ट्रार को देना जरूरी होता है।

शेयरधारक अपनी इच्छा अनुसार कभी भी अनेकों बार अपना नॉमिनी बदल भी सकता है, किन्तु उसे हर बार इसकी सूचना रजिस्ट्रार को देना होता है।

कोई अवयस्क ओपीसी का सदस्य या नामांकित नहीं हो सकता है।

किसी भी विदेशी व्यक्ति को ओपीसी में शामिल नहीं किया जा सकता है।

एक ओपीसी को अधिनियम की धारा 8 के तहत एक कंपनी (गैर लाभकारी कम्पनी) में शामिल या परिवर्तित नहीं किया जा सकता है।

इसके अलावा एक ओपीसी गैर-बैंकिंग वित्तीय निवेश गतिविधियों में भी शामिल नहीं हो सकती है।

इसमें किसी भी बॉडी कॉरपोरेट की प्रतिभूतियों में निवेश भी शामिल है।

एक बार ओपीसी बना लेने के बाद आप जब तक इसका नियमित वार्षिक अनुपालन पूरा करते रहेंगे, तब तक यह कार्यरत एवं अस्तित्व में रहेगी।

छोटे व्यवसाय के मालिकों के लिए यह एक बहुत बढ़िया संरचना है।

व्यवसायी का अपने व्यवसाय पर पूरा नियंत्रण भी रहता है। तथा देयता भी सीमित होती है।

ओपीसी एक कानूनी मान्यता प्राप्त संरचना है, इसलिए इसे बैंक से ऋण मिलना भी आसान हो जाता है।

एक व्यक्ति कंपनी को पंजीकृत करना भी सरल है। एक भारतीय नागरिक जो भारत का निवासी भी है, वह एक व्यक्ति कंपनी बना सकता है।

रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज में आपको अपनी कंपनी का नाम रजिस्टर्ड कराना होगा।

कंपनी के नाम के पीछे ठीक उसी तरह ओपीसी ‘OPC’ यानी वन परसन कंपनी लगाना होगा जैसे ‘प्राइवेट लिमिटेड’ लिखते हैं।

सीमित देयता साझेदारी
लिमिटेड लाइबिलिटी पार्टनरशिप  (एलएलपी)
Limited Liability Partnership (LLP)

लिमिटेड लाइबिलिटी पार्टनरशिप फर्म, 2008 के सीमित देयता भागीदारी अधिनियम द्वारा शासित व्यवसाय संरचना का एक नया रूप है।

इसे प्रारंभ करने का उद्देश्य सामान्य भागीदारी में शामिल कमियों को दूर करना है।

लिमिटेड लाइबिलिटी पार्टनरशिप अपने नाम की तरह कंपनी की सीमित देयता का सिद्धांत एवं साझेदारी फर्म का लचीलापन दोनों खूबियां प्रदान करती है।

दो या दो से अधिक व्यक्तियों की कोई भी नई या मौजूदा फर्म सीमित देयता साझेदारी फर्म बना सकती है।

यदि आप बिजनेस को अपने निपुण एवं समझदार मित्रों के साथ शुरू करना चाहते हैं तो आपके लिए  एलएलपी व्यवसाय संरचना बेहतरीन विकल्प है।

एलएलपी निगमन आसान और सस्ता भी है। इसमें नाम मात्र सरकारी नियामकों एवं कागजी कार्यवाही का अनुपालन करना होता है।

यह कर देयता में भी लचीलापन प्रदान करती है। यहां आय, व्यय और लाभ मालिक के कर रिटर्न का हिस्सा बन जाते हैं।

निगमन के बाद एलएलपी का अपना कानूनी अस्तित्व  तथा

एलएलपी का अलग कानूनी अस्तित्व होता है, जो उसके साझीदारों के बदलने पर भी प्रभावित नहीं होता है।इसका अपना स्थायी खाता संख्या (पैन) होता है।

इन्हीं विषेशताओं के कारण यह मध्यम स्तर के उद्योगों एवं व्यवसायों के लिए बहुत ही उपयोगी साबित हुई है।

फ्रीलांसरों एवं पेशेवर लोगों के लिए तो यह बहुत ही उपयोगी है। जैसे चार्टर्ड अकाउंटेंट कॉस्ट एकाउंटेंट कंपनी सेक्रेटरी आदि।

देनदारियों के मामले में, एलएलपी एक इकाई के रूप में अपनी संपत्ति की पूरी सीमा तक ही उत्तरदायी है।

शेष सभी सदस्यों की देयता उनके सहमत योगदान की सीमा तक ही सीमित होती है।

सीमित देयता वाले भागीदार व्यवसाय में सक्रिय भाग नहीं ले सकते हैं। उन्हें निष्क्रिय या स्लीपिंग पार्टनर कहा जाता है।

हालांकि, एक कंपनी से एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि एक ‘लापरवाह’ साथी की देयता असीमित बनी रहती है।

सामान्य साझेदारी के विपरीत इस तरह की साझेदारी सीमित भागीदारों की मृत्यु या दिवालियापन से समाप्त नहीं होती है।

सीमित देयता साझेदारी भागीदारों को अन्य भागीदारों की वजह से उत्पन्न होने वाले किसी भी नकारात्मक मुद्दों से संरक्षित रहने की अनुमति प्रदान करती है।

एक निजी या सार्वजनिक लिमिटेड कंपनी के साथ-साथ साझेदारी फर्मों को सीमित देयता भागीदारी में परिवर्तित करने की भी अनुमति होती है।

एलएलपी तब तक काम कर सकती है जब तक कि आप को बाहरी फाइनेंस की जरूरत नहीं होती है।

यदि फंड की जरूरत हो तो इस एलएलपी को तुरंत एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में बदला जा सकता है।

निजी सीमित कंपनी
प्राइवेट लिमिटेड कंपनी
(Private Limited Company)

यह एक निजी तौर पर स्थापित लघु व्यवसाय संरचना  है। जो सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली व्यावसायिक संरचनाओं में से एक है।

प्रायवेट लिमिटेड कंपनी की स्थापना भारतीय कंपनी अधिनियम 2013 के अनुसार की जा सकती है।

यह निगमन के बाद कराधान के साथ-साथ देयता के मामले में एक अलग कानूनी इकाई है।

जो पुराने सदस्यों के छोड़ने या नए सदस्यों के शामिल होने से प्रभावित नहीं होती है।

इसे अपने नाम से संपत्ति रखने का अधिकार है और यह  मुकदमेबाजी में भी शामिल हो सकती है।

शेयरधारकों की व्यक्तिगत देयता उनकी शेयर पूंजी तक सीमित होती है।

इसकी न्यूनतम भुगतान पूंजी एक लाख तथा अधिकतम की कोई सीमा नहीं है।

एक निजी कंपनी में आवश्यक सदस्यों की न्यूनतम संख्या 2 एवं अधिकतम सीमा 200 सदस्य है।

हालांकि, शेयरों के संयुक्त सदस्यों को एक सदस्य के रूप में गिना जाता है।

शेयरधारक कंपनी के दैनिक मामलों की देखभाल के लिए न्यूनतम दो संचालकों की नियुक्ति कर सकते हैं।

जिसकी अधिकतम सीमा एक विशेष प्रस्ताव पारित करके 15 संचालक तक  बढ़ाई जा सकती है।

संचालक मंडल को प्रत्येक तिमाही में मिलना चाहिए। शेयरधारकों और संचालकों की कम से कम एक वार्षिक आम बैठक भी बुलाई जानी चाहिए।

एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के शेयरों को व्यक्तियों को बेचा या हस्तांतरित किया जा सकता है, जो बदले में कंपनी के मालिक बन जाते हैं।

हालाँकि, शेयरों का सार्वजनिक रूप से कारोबार नहीं किया जा सकता है।

इन कंपनियों को अपने नाम के साथ प्राइवेट लिमिटेड कंपनी लिखना आवश्यक होता है।

निगमित होने के बाद, कंपनी को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में अपनी वार्षिक आरओसी रिटर्न दाखिल करना जरुरी होता है।

कंपनी अधिनियम अनुसार वित्तीय लेनदेन, बोर्ड मीटिंग एवं वार्षिक प्रतिवेदन के दस्तावेज बनाने जरूरी है।

शेयरधारक और सदस्य कंपनी अधिनियम, 2013 के अनुसार देयता के स्तर पर विभिन्न प्रकार की कंपनियां बना सकते हैं।

क) अंश से सीमित कंपनी

यह एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी का सबसे सामान्य रूप है। अंश धारी व्यक्ति का दायित्व केवल अंश की कीमत तक ही सीमित होता है।

यदि अंश की कीमत चुकता नहीं है तो वह उसकी कीमत चुकता करके अपना दायित्व पूरा कर सकता है।

बी) गारंटी से सीमित कंपनी

इस प्रकार की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में, सदस्यों की देयता ज्ञापन द्वारा बताई गई राशि तक सीमित होती है।

बंद होने की दशा में सदस्य द्वारा कंपनी की संपत्तियों में स्वीकृत योगदान राशि तक उसका दायित्व सीमित होता है।

सी) असीमित कंपनी

इस प्रकार की कंपनी के सदस्यों की देयता असीमित होती है।

नुकसान की स्थिति में लेनदारों को भुगतान करने के लिए सदस्यों की निजी संपत्ति को फिर से ऋण लेने के लिए उपयोग किया जा सकता है।

आप अपनी सुविधानुसार किसी भी प्रकार की कंपनी स्थापित कर सकते हैं।

व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए शेयरों से सीमित कंपनी सदस्यों को अधिकतम सुरक्षा प्रदान करती है।

इसलिए इसे ही सबसे अधिक व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है।

शेयरधारक कंपनी मामलों में उत्तरदायी हुए बिना शेयरों को बेचकर कंपनी से बाहर हो सकते हैं।

शेयरधारक अन्य शेयरधारकों की मर्जी से अन्य व्यक्तियों से शेयर खरीदी बिक्री कर सकते हैं। परंतु बाजार में आम जनता के साथ उनके शेयरों की पेशकश नहीं कर सकते।

सार्वजनिक सीमित कंपनी
पब्लिक लिमिटेड कंपनी
(Public Limited Company)

पब्लिक लिमिटेड कंपनी की स्थापना कंपनी अधिनियम 2013 के अनुसार की जा सकती है।

एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी (सार्वजनिक सीमित कंपनी) की स्थापना के लिए कम से कम सात सदस्य होना चाहिये। अधिकतम् के लिए कोई सीमा नहीं है।

सार्वजनिक सीमित कंपनी की न्यूनतम चुकता पूंजी ₹ 5 लाख उच्चतम अधिनियम अनुसार निर्धारित की जा सकती है।

सार्वजनिक सीमित कंपनी के संचालन के लिए कम से कम तीन संचालक होने चाहिए अधिकतम की कोई सीमा नहीं है।

पब्लिक लिमिटेड कंपनी को कड़ाई से विनियमित किया जाता है। सार्वजनिक सीमित कंपनी एक स्वतंत्र कानूनी व्यक्ति है।

इसका अस्तित्व उसके किसी भी शेयरधारक की मृत्यु, सेवानिवृत्ति या दिवालिया होने से प्रभावित नहीं होता है।

कंपनी अधिनियम के अनुसार सभी पब्लिक लिमिटेड कंपनी को उनके नाम के बाद ‘सीमित’ शब्द जोड़ना अनिवार्य है।

सार्वजनिक सीमित कंपनी को व्यवसाय शुरू करने से पहले रजिस्ट्रार आफ कंपनीज (आरओसी) से संचालन प्रमाण-पत्र लेना जरूरी होता है।

सार्वजनिक सीमित कंपनी निजी तौर पर प्रारंभिक सार्वजनिक पेशकश (आईपीओ) के द्वारा या शेयर बाजार में ट्रेडिंग के माध्यम से अपने शेयरों को बेचकर पूंजी इकट्ठा करती है।

शेयर खरीदने वाले शेयरधारक उस सार्वजनिक सीमित कंपनी के सदस्य  बन जाते हैं। एकत्र की गई राशि शेयर पूंजी कहलाती है।

पब्लिक लिमिटेड कंपनी या तो स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हो सकती है या अनलिस्टेड भी रह सकती है।

लिस्टेड पब्लिक लिमिटेड कंपनी के शेयरधारक अपने शेयरों की स्टॉक एक्सचेंज में स्वतंत्र रूप से खरीदी बिक्री कर सकते हैं।

कंपनी अधिनियम के तहत सार्वजनिक सीमित कंपनी को अपना एक प्रॉस्पेक्टस पब्लिक के लिए जारी करना जरुरी होता है।

प्रॉस्पेक्टस कंपनी की गतिविधियों एवं वास्तविक वित्तीय स्थितियों से संबंधित व्यापक विवरण है। इसमें गलत विवरण देना दंडनीय अपराध है।

सार्वजनिक सीमित कंपनी के शेयर स्वतंत्र रूप से हस्तांतरणीय हैं। इसके संबंध मे कंपनी को नोटिस या अन्य शेयरधारकों की पूर्व सहमति लेने की जरूरत नहीं होती है।

सार्वजनिक सीमित कंपनी कंपनी के सदस्य की देयता उसके शेयरों के अंकित मूल्य तक ही सीमित होती है।

अंकित मूल्य का पूरा भुगतान करने के बाद कंपनी के लेनदारों को भुगतान करने का उसका कोई दायित्व नहीं  होता है।

परंतु शेयरधारकों को उनके स्वयं के द्वारा किए गए अवैध कार्यों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है।

शेयरधारकों को एलपीसी के व्यवसाय में प्रतिदिन के प्रबंधन में भाग लेने का अधिकार नहीं होता है।

सार्वजनिक सीमित कंपनी के सभी नीतिगत निर्णय प्रबंधन के समस्त अधिकार सार्वजनिक सीमित कंपनी के निदेशक मंडल के पास होते हैं।

इन्हें बोर्ड स्तर पर बहुमत के नियम द्वारा लिया जाता हैं।  यह प्रबंधन में दिशा की एकता सुनिश्चित करता है।

सार्वजनिक सीमित कंपनी को सरकार के साथ-साथ भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) बाजार नियामक के निर्देशों  का भी अनुपालन करना  आवश्यक होता है।

इसमें  निदेशक मंडल पर स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति, लेखा पुस्तकों का सार्वजनिक प्रकटीकरण तथा निदेशकों और मुख्य कार्यपालकों के वेतन विवरण भी शामिल है।

सार्वजनिक सीमित कंपनी के गठन करने संचालन करने एवंं वाइंडिंग के लिए कंपनियों के अधिनियम, 2013 के तहत विभिन्न कानून नियम और विनियमों निर्धारित हैं।

जिनका कडाई से पालन करना अनिवार्य है।

अभी तक आपने सभी निगमित अनिगमित व्यवसाय संरचना से संबंधित जानकारी प्राप्त कर ली है।

अब आप अपने लिए परफेक्ट व्यवसाय संरचना स्वयं निर्धारित कर सकते हैं।

परफेक्ट व्यवसाय संरचना स्वयं कैसे निर्धारित करें

अपने उद्यम को पंजीकृत करते समय, यह ध्यान रखें कि प्रत्येक व्यवसाय संरचना में अनुपालन के स्तर अलग अलग होते हैं।

आप अकेले निवेश कर व्यवसाय करने की योग्यता एवंं क्षमता रखते हैं तो आपके लिए प्रोप्राइटरशिप या ओपीसी  व्यवसाय संरचना परफेक्ट रहेगी।

यदि आपको दो या अधिक व्यक्तियों के साथ मिलकर  काम करना पसंद हैं, तो आप सीमित देयता भागीदारी या प्राइवेट लिमिटेड कंपनी व्यवसाय संरचना चुन सकते हैं।

शुरुआत में यदि आप पूंजी पर अधिक जोखिम उठाना नहीं चाहते हैं, तो एकल स्वामित्व साझेदारी अथवा एचयूएफ व्यवसाय संरचना उपयुक्त रहेगी।

आप एवंं आपकी टीम को विश्वास है कि आप सेटअप और अनुपालन लागतों को वसूली कर सकते हैं,

तो  फिर, आप एक व्यक्ति कंपनी, एलएलपी या एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी का विकल्प चुन सकते हैं।

प्रोप्राइटरशिप,साझेदारी फर्म एवंं एचयूएफ इन सभी व्यावसायिक संरचनाओं में असीमित दायित्व है।

वसूली के मामलों में व्यक्तिगत संपत्ति का जोखिम ज्यादा  है। जबकि, कंपनी और एलएलपी में सीमित देयता है।

एकल स्वामित्व और एचयूएफ पर आयकर की सामान्य दरें लागू होती हैं लेकिन साझेदारी और कंपनी जैसी अन्य संस्थाओं के मामले में 30% की कर दर लागू है।

पूंजी का प्रबंध बाहर से करने की योजना है, तो  प्राइवेट लिमिटेड कंपनी या एलएलपी का चयन बेहतर रहेगा।

वर्तमान में सभी व्यवसाय संरचनाओं का आनलाइन पंजीयन किया जा सकता है।

पंजीयन के लिए आप कुछ कानूनी विशेषज्ञ फर्मों  एवंं सलाहकारों की सहायता भी ले सकते हैं।

आशा है आपको मेरा यह लेख अवश्य पसंद आया होगा। आपके विचार सुझाव कमेंट्स के माध्यम से स्वीकार हैं

अगले लेख में व्यवसाय संरचनाओं के पंजीयन से संबंधित जानकारी  पर विस्तार से चर्चा करेंगे तब तक के लिए बाय बाय।

7 thoughts on ““व्यवसाय संरचना” क्या है? अपने लिए सही व्यवसाय संरचना कैसे चुनें ।”

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