व्यवसाय क्या है? अर्थ एवं प्रकार जिन्हें जानना आपके लिए जरुरी है।

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बिजनेस क्या है? फोटो बोलता है“व्यवसाय क्या है”? अर्थ एवं प्रकार जिन्हें जानना आपके लिए जरूरी है।

इस लेख में हम व्यवसाय क्या है ? इस पर गहराई से चर्चा करेंगे।

बिजनेस और व्यवसाय दोनों का मतलब अलग अलग नहीं है। Business बिजनेस अंग्रेजी शब्द है।

इसे ही हिन्दी में व्यवसाय कहते हैं। इसलिए इन शब्दों में भ्रमित होने की जरुरत नहीं है।

बिजनेस/ व्यवसाय को बोलचाल की भाषा में और भी अन्य अनेकों शब्दों से भी जाना जाता हैं। जैसे उद्यम, व्यापार, धंधा, काम-धंधा, पेशा, काम-काज, कारोबार आदि।

बिजनेस इस शब्द का कंपनी, इंटरप्राइज,फर्म प्रतिष्ठान व्यापार के रूप में भी उपयोग किया जाता है।

मैंने यह लेख  व्यवसाय क्या है? विषेश  रूप से ऐसे लोगों के लिए लिखा है, जिन्होंने कभी कामर्स विषय नहीं पढ़ा है। 

और वे व्यवसाय में रुचि रखते हैं, तथा अपना खुद का व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं। 

व्यवसाय बहुत व्यापक शब्द है। जिसे समझाने के
लिए मैंने व्यवसाय क्या है इस लेख में हर उस बात को शामिल किया है। जिसे जानना सभी व्यवसायी के लिए जरुरी है।

व्यवसायी / बिजनेसमेन कौन?

व्यवसायी/ बिजनेसमेन यह कोई भी हो सकता है। जो बिजनेस कर रहा है। यह कोई व्यक्ति हो सकता है, या व्यक्ति के द्वारा स्थापित कोई संस्थान भी हो सकता है।

बिजनेसमेन अंग्रेजी शब्द है। हिन्दी में इसे ही व्यवसायी कहते हैं।

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आइए विस्तार से समझते हैं,

(1) व्यवसाय क्या है ?

दुनिया में जीवित रहने के लिए प्रत्येक मनुष्य को हमेशा कुछ ना कुछ उत्पाद एवं सेवा की जरूरत होती ही रहती है।

इसे पूरा करने के लिए सभी लोग अपने दैनिक जीवन में, हर वक्त कुछ ना कुछ काम करते ही रहते हैं।

इस कारण अनेकों व्यवसायिक गतिविधियों ने जन्म लिया है।

चलिए, इनको और अधिक गहराई से समझते हैं।

मानव जीवन में किए जाने वाले सभी कामों को दो मुख्य भागों में बांटा जा सकता है।

अ) अनार्थिक काम  ब) आर्थिक काम

अनार्थिक काम: ऐसे सभी काम जिनका उद्देश्य पैसे कमाना नहीं है।

आर्थिक काम :  ऐसे सभी काम जिनका उद्देश्य पैसे कमाना है।

आर्थिक काम एवं अनार्थिक काम में अंतर को इस उदाहरण से समझें। खाना बनाने का काम

(अ) परिवार के लिए खाना बनाया। यहां खाना बनाने का उद्देश्य धन कमाना नहीं है। इसलिए यह अनार्थिक कार्य हुआ।

(ब)  होटल में खाना बनाया। यहां खाना बनाने का कार्य धन कमाने के लिए किया गया है। इसलिए यह आर्थिक काम हुआ।

इस प्रकार एक ही काम को जब पैसे कमाने के उद्देश्य से किया गया, तो वह आर्थिक काम हुआ।

परन्तु यही कार्य जब परिवार के लोगों के लिए किया गया, जिसका उद्देश्य पैसे कमाना नहीं है। तो यह अनार्थिक काम हो गया।

पैसे कमाने के उद्देश्य से किए गए समस्त मानवीय कार्य बिजनेस कहलाते हैं।

इन आर्थिक कार्यों में उत्पन्न करना, उत्पादन करना, खरीदना बेचना, परिवहन, भंडारण,  वितरण करना विनिमय एवं हस्तांतरण सभी सम्मिलित हैं। इस प्रकार

वे सभी मानवीय क्रियाएं, जिनमें पैसे कमाने हेतु, उत्पाद, सेवाओं का उत्पादन, क्रय-विक्रय, हस्तांतरण, वितरण, विनिमय किया जाता है उन्हें व्यवसाय/ बिजनेस  कहते हैं।

परंतु व्यवसाय क्या है यह  जानकारी अभी अधूरी है। चलिए और आगे चलते हैं।

(2) व्यवसाय क्या है ?

व्यवसाय संबंधी कुछ अन्य विषेश जानकारी इस प्रकार है

व्यवसाय शुरू करने के लिए पूंजी की आवश्यकता :

व्ययवसाय उत्पाद एवं सेवा के निर्माण, खरीदी बिक्री तथा प्रदायगी हेतु संसाधनो की जरूरत होती है।

जैसे भूमि, भवन, संयंत्र, वाहन,उपस्कर एवं अन्वायुक्ति आदि।

इसके लिए धन का निवेश करना होता है। व्यवसाय में लगाए गए धन को पूंजी कहते हैं।

इसलिए व्यवसाय शुरू करने के लिए आपके पास पर्याप्त पूंजी का होना जरुरी है। पूंजी की व्यवस्था आप ऋण लेकर भी कर सकते हैं।

(ऋण (लोन) से संबंधित पूरी जानकारी हमारे लेख ऋण कैसे प्राप्त कर सकते हैं में पढ़ें।)

लाभ में अनिश्चितता और जोखिम:

यह तो आप जानते ही हैं कि बिजनेस हमेशा लाभ कमाने के उद्देश्य से ही किया जाता है।

किंतु बिजनेस में सदा जोखिम और अनिश्चितता तो बने ही रहते हैं। और इस जोखिम को तो वहन करना ही होता है।

मतलब यह कि बिजनेस में हर समय एक जैसा लाभ कभी भी नहीं मिल सकता है।

यह कभी कम तो कभी ज्यादा हो सकता है। कभी -कभी ऐसा भी हो सकता है कि लाभ हो ही नहीं। या फिर कभी नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।

बिजनेस में दो पक्षों का होना जरुरी:

बिजनेस में लेनदेन हेतु कम से कम दो पक्षों का होना जरुरी होता है। एक पक्ष खरीदार और दूसरा पक्ष विक्रेता।

बिजनेस को सभी पक्षों के हितों को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए।

बिजनेस में वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन, वितरण, विनिमय, हस्तांतरण, लेनदेन कुछेक का होना जरूरी होता है।

इन सभी क्रियाओं में नियमितताओं का होना जरूरी है। तात्पर्य यह कि ये क्रियाएं बार बार होती रहनी चाहिए।

केवल एक बार खरीदी बिक्री कर लेना बिजनेस नहीं कहलाएगा।

पूरी खरीदी दुबारा बिक्रय के लिए की जानी चाहिए।

अर्थात स्वयं के उपयोग के लिए या किसी को गिफ्ट देने के लिए खरीदी की गई है तो ये क्रियाएं बिजनेस नहीं कहलाएंगी।

ये समस्त क्रियाएं देश के कानून और नियमानुसार ही होना चाहिए।

इन सभी क्रियाओं को सरकार और समाज द्वारा मान्यता मिली होना चाहिए।

इस प्रकार व्यवसाय क्या है?
पूंजी लगाकर, जोखिम उठाकर, वे आर्थिक काम जो देश और समाज से मान्यता प्राप्त हैं, तथा नियम और कानून अनुसार किए गए हैं, उन्हें व्यवसाय कहते हैं।

अब आप अच्छी तरह से जान गए हैं कि  व्वसाय क्या है।

# व्यवसाय के प्रकार

उत्पन्न करने से लेकर उत्पाद या सेवा को अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचाने में की गई सभी आर्थिक गतिविधियों को तीन भागों में बांटा गया है। जो इस प्रकार हैं

1.व्यापार 2. सेवा 3. उद्योग

इस प्रकार फुटपाथ पर बैठकर छोटे से छोटा काम करने वालों से लेकर टाटा बिडला अंबानी जैसे बड़े उद्योगपति
सभी लोग इन तीन श्रेणियों के अंतर्गत ही काम करते हैं।

आपको भी अपनी सुविधानुसार अपने लिए इन्हीं में से उचित बिजनेस को तलाशना होगा। इसलिए हम प्रत्येक श्रेणी को विस्तार से समझेंगे।

1) व्यापार करना:

धन कमाने हेतु वस्तुओं को खरीदने बेचने, विनिमय एवं हस्तांतरण करने की क्रिया को व्यापार करना कहते हैं।

वस्तुओं को अधिक मात्रा (थोक) में सस्ते में खरीदना। ये खरीदी उत्पादक, निर्माता थोक विक्रेता से की जा सकती है।

इन वस्तुओं पर हुए खर्च और लाभ की राशि को जोड़ कर बेच देना, इसे ही व्यापार करना कहते हैं।

इसे ट्रेडिंग बिजनेस (Trading Business) मर्केंटाइल बिजनेस (Mercantile Business) भी कहते हैं।

वर्तमान में आप इसे आनलाइन एवं आफलाइन भी कर सकते हैं।

व्यापारिक गतिविधियों को दो बड़े भागों में बांटा गया है।जो इस प्रकार हैं।

अ) आंतरिक व्यापार
ब)  बाह्य व्यापार:

अ) आंतरिक व्यापार: देश की सीमा के अंदर किए गए व्यापार को आंतरिक व्यापार कहते हैं।

इसमें एक राज्य से दूसरे राज्य, एक जिले से दूसरे जिले, एक शहर से दूसरे शहर, एक गांव से दूसरे गांव, सभी स्तर पर आपसी क्रय विक्रय किया जाता है।

इस आंतरिक व्यापार को पुन: दो भागों में बांटा गया है। जो इस प्रकार हैं

1) थोक व्यापार ( wholesaler )
2)  फुटकर व्यापार (Retailer)

1) थोक व्यापार (wholesaler) इसमें थोक व्यापारी द्वारा, निर्माता या उत्पादक से अधिक मात्रा में, थोक मूल्य पर माल खरीद लिया जाता है।

इस माल को वह फुटकर व्यापारी अथवा ग्राहक को कुछ लाभ लेकर बेच देता है।

ब) फुटकर व्यापार (Retailer) इसमें फुटकर व्यापारी, द्वारा उत्पादक, निर्माता या थोक व्यापारी से माल खरीदा जाता है।

इस माल को वह सीधे उपभोक्ताओं को खुदरा मूल्य पर बेच कर लाभ कमाता है।

ब) बाह्य व्यापार: देश के बाहर दूसरे देशों के साथ व्यापार करने को बाह्य व्यापार कहते हैं।

बाह्य व्यापार को तीन भागों में बांटा गया है।

i)   आयात व्यापार      (Import)
ii)  निर्यात व्यापार      (Export)
iii) पुर्ननिर्यात व्यापार (Reexport)

i) आयात व्यापार: इस व्यापार के अंतर्गत दूसरे देशों से माल खरीद कर अपने देश मे विक्रय किया जाता है।

ii) निर्यात व्यापार: व्यपार के इस प्रकार में अपने देश में उत्पादन कर, माल बना कर, अथवा खरीद कर अन्य दूसरे देशों को माल विक्रय किया जाता है।

iii) पुर्ननिर्यात व्यापार (Reexport) व्यापार के इस वर्ग में किसी अन्य देश से आयात कर दूसरे देश को निर्यात किया जाता है।

2) सेवा व्यवसाय
(Service Business)

धन कमाने के लिए किसी विशेष विषय/हूनर में विषेशज्ञता प्राप्त करना। उसे शुल्क लेकर जरूरत मंद लोगों को प्रदान करना।

इसे सेवा व्यवसाय कहते हैं। इसे पेशा वृत्ति प्रोफेशन (Profession) सर्विसेज (Services) भी कहते हैं।

इसे शुरू करने हेतु आपको हूनर विशेष में अध्ययन कर पात्रता प्राप्त संस्थानों से रजिस्ट्रेशन करवाना होता है।

सेवा व्यवसाय में डॉक्टर, वकील,अध्यापक, कंपनी सचिव, संवैधानिक लेखाकार ऐसे अनेक पेशेवर कार्य किए जा सकते हैं।

इसके अतिरिक्त टेलरिंग, कारपेंटर परिवहन, आई टी, इवेंट मैनेजमेंट, भोजनालय, रेस्टोरेंट, ब्यूटी पार्लर, मरम्मत इकाई ऐसे ही अन्य अनेक सेवा से संबंधित व्यवसाय भी स्थापित किए जा सकते हैं।

सेवा उद्योग में वे सभी कार्य भी सम्मिलित हैं, जिन्हें बतौर व्यवसाय के सहायक,व्यवसायी की मदद के लिए किया जाना जरूरी होता है, उदाहरणार्थ  वित्त एवं बैंकिंग, परिवहन, बीमा, दूर संचार, भंडारण, विज्ञापन से संबंधित सेवाएं आदि।

3) उद्योग लगाना

उद्योग से आशय उत्पादन, उत्खनन, निषकर्षण, प्रजनन, निर्माण विनिर्माण, प्रक्रियन आदि सभी कार्यों से है।

समस्त प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं को मानवीय श्रम एवं मशीनों की सहायता से और अधिक उपयोगी बनाना। तथा बाजार में अथवा ग्राहकों को प्रदाय करने से है।

उद्योगों को तीन भागों में बांटा गया है।

क)  प्राथमिक उद्योग  (Primary Industry)
ख)  द्वितियक उद्योग  ( Secondary Industry)
ग)  तृतीयक/सेवा उद्योग। (Service Industries)

क)  प्राथमिक उद्योग  (Primary Industry)
प्राकृतिक संसाधन से संबंधित उद्योगों का समावेश होता है। जैसे खनन, कृषि वनोपज संग्रहण उद्योग

प्राथमिक उद्योग  (Primary Industry) को दो भागों में बांटा गया है।

अ) जननिक उद्योग (Genetic Industries)
ब)  निष्कर्षण उद्योग (Extractive Indus.)

अ)  जननिक उद्योग (Genetic Industries)
इसके अंतर्गत प्राकृतिक संसाधन कृषि, पशु पालन, वन, सी फुड से संबंधित कार्य आते हैं।

ब)  निष्कर्षण उद्योग (Extractive Indus.)

इसके अंतर्गत जमीन से खनन कोयला लोहा क्रूड आइल से संबंधित उद्योग संमिलित हैं।

ख)  द्वितियक उद्योग  ( Secondary Industry)
इस उद्योग में प्राथमिक उद्योगों द्वारा प्राप्त वस्तुओं को विभिन्न तरीकों से उपयोगी बनाने के काम शामिल हैं। कपास से सूत बनाना, लकड़ी से फर्नीचर बनाना।

कार्य के हिसाब से द्वितियक उद्योगों को दो भागों में बांटा गया है।

अ)  विनिर्माण उद्योग
ब)  निर्माण उद्योग

अ)  विनिर्माण उद्योग: इस उद्योग में कच्चे माल से तैयार
माल बनाया जाता है मुख्य रूप से उपयोगी उत्पाद का निर्माण किया जाता है। विनिर्माण उद्योग को चार भागों में बांटा गया है।

i) विश्लेषणात्मक उद्योग एक ही वस्तु का विश्लेषण प्रथक्करण कर अनेक उत्पाद बनाते हैं जैसे तेल शोधक उद्योग

ii) कृतिम उद्योग अलग अलग संगठकों को मिलाकर प्रक्रिया द्वारा नये उत्पाद का रूप दिया जाता है। जैसे सीमेन्ट उद्योग

iii)  प्रक्रियायी उद्योग ये उद्योग उत्पाद निर्माण के लिए
अलग अलग क्रमिक प्रक्रिया चरणों के द्वारा उत्पाद बनाते हैं। जैसे कागज कपड़ा चीनी उद्योग

vi)  सम्मेलित उद्योग इन उद्योगों में नये उत्पाद के  लिए स्पेअर्स जोड़कर नया उत्पाद तैयार किया  जाता है। जैसे टीवी कंप्यूटर कार आदि।

ब) निर्माण उद्योग इस उद्योग में निर्माण कार्य किया जाता
है इसमें सड़क पुल बांध नहरें सुरंग बिल्डिंग आदि का
समावेश है।

ग)  तृतीयक/सेवा उद्योग।  (Service Industries)
ये उद्योग प्राथमिक एवं द्वितियक उद्योगों को सेवा सुविधा प्रदान करते हैं। इनमें वित्त, बैंकिंग, यातायात कंटेनर भंडारण दूर संचार विज्ञापन सुविधाएं आदि सम्मिलित हैं

व्यवसाय के स्वामित्व के अनुसार व्यवसाय का वर्गीकरण

अपना व्यवसाय शुरू करने के इच्छुक व्यक्तियों के लिए यह जानकारी उनका व्यवसाय प्रारंभ करने मे बहुत सहायक होगी।

एकल स्वामित्व (प्रोप्राइटरशिप बिजनेस ) (Proprietorship Business)

एकल स्वामित्व या प्रोप्राइटरशिप बिजनेस एक ही व्यक्ति के द्वारा शुरू किया जाता है। वह व्यक्ति उस व्यवसाय का मालिक होता है।

वही बिजनेस में धन लगाता है। तथा सारा कारोबार करता है। एवं होने वाले लाभ हानि को भी वहन करता है। उसकी असीमित देयता होती है।

बिजनेस का यह प्रारुप पेशेवर, व्यक्ति, सेवा कार्य, एवं छोटे दुकानदारों के लिए उत्तम है।

साझेदारी  (पार्टनरशिप बिजनेस)
(Partnership Business)

साझेदारी बिजनेस दो या दो से अधिक व्यक्तियों द्वारा मिल कर स्थापित किया जाता है।

सभी साझदारों के मध्य एक रजिसटर्ड पार्टनरशिप डीड के द्वारा बिजनेस से संबंधित समझौता किया जाता है।

इस समझौते में यह सब पहले से तय कर लिया जाता है, कि कौन-कौन कितना-कितना धन लगाएगा। कौन क्या काम करेगा। तथा लाभ को आपस में कैसे बांटा जावेगा।

इस साझदारी बिजनेस को साझदारों की देयता तय करते हुए तीन तरह से बनाया जा सकता है।

1. सामान्य साझेदारी
2. सीमित साझेदारी
3. सीमित देयता साझेदारी

फ्रेंचाइजी बिजनेस
(Franchise business)

इस बिजनेस में आप ब्रांडेड कंपनी से उसके उत्पाद एवं सेवा को बेचने का अधिकार प्राप्त कर व्यापार कर सकते  हैं।

कम निवेश, कम समय एवं थोड़े से अनुभव के साथ बिना जोखिम आप इसे सरलता से शुरू कर सकते हैं।

फ्रेंचाइजी देने वाली कंपनी अपनी फ्रेंचाइजी को बिजनेस संबंधी प्रशिक्षण एवं खरीदने से लेकर बेचने तक की सभी सुविधाएं भी देती है।

इसके लिए वह फ्रेंचाइजी रायल्टी शुल्क वसूल करती है।
इस बिजनेस में आप एक तरह से किसी ब्रांडेड कंपनी की अधिकृत शाखा के रूप में ही काम करते हैं।

संयुक्त हिंदू परिवार व्यवसाय
(Joint Hindu Family Business)

संयुक्त हिंदू परिवार व्यवसाय के रूप में भी व्यवसाय प्रारंभ किया जा सकता है। परिवार का मुखिया इसका मालिक होता है यह हिन्दू अधिनियम अनुसार शासित होता है। केवल परिवार के लोग इसके सदस्य होते हैं

कोआपरेटिव सोसायटी
(Cooperative Society)
इसमें काम करनेवाले व्यक्तियों द्वारा सहकारी समिति  बना कर काम किया जाता है। इसे सहकारिता अधिनियम के अनुसार स्थापित किया जाता है।

इसे कंज्यूमर को आपरेटिव सोसाइटी एवं वर्कर को- आपरेटिव सोसाइटी दोनों तरह से बनाया जा सकता है।

एक व्यक्ति कंपनी
(One Person Company)

एक व्यक्ति कंपनी (ओपीसी) इसे वर्ष 2013 से लागू किया गया है। इसका मालिक और सदस्य एक ही होता है।

इसे केवल भारतीय नागरिक खोल सकता है। विदेशी व्यक्ति को इसकी अनुमति नहीं है। इसमें मालिक एवं कंपनी का अस्तित्व अलग अल ग होता है।

प्राइवेट लिमिटेड कंपनी
(Private Limited Company)

निजी सीमित कंपनी यह बहुत प्रचलित स्वरूप है। इसमें 2 से 200 तक सदस्य हो सकते हैं।  इसमें 2 से 15 तक डायरेक्टर भी हो सकते हैं।

यह कपनी अधिनियम 2013 अनुसार स्थापित की जाती है। यह अपने आर्टिकल आफ एसोसिएशन में बताए नियम एवं शर्तों के अनुसार सभी कार्य करती है।

इसे अपनी लेखा पुस्तकें, वार्षिक प्रतिवेदन बनाना एवं संचालक मंडल की सभा कराना भी जरूरी होता है।

प्राइवेट लिमिटेड कंपनी 3 तरह से बनाई जा सकती है।

1. सीमित अंशपूंजी कंपनी
2. सीमित ग्यारंटी कंपनी
3. असीमित कंपनी

सार्वजनिक लिमिटेड कंपनी
(Public limited company)

सार्वजनिक सीमित कंपनी, कंपनी अधिनियम 2013 के अनुसार स्थापित की जा सकती है।

इन कंपनियों को कंपनी निगमन और शुरुआत हेतु सरकार से प्रमाणपत्र लेना पड़ता है।

इसी तरह प्रबंधन में नियुक्ति एवं वैधानिक बैठकों के आयोजन हेतु भी सरकार से मंजूरी लेना होता है।

इसमें कम से कम 7 सदस्य अवश्य होना चाहिए। अधिकतम सदस्यों की कोई सीमा नहीं होती।

यह आम जनता को अपने शेयरों की सदस्यता लेने के लिए आमंत्रित कर सकती है।

इसकी न्युनतम पेडअप अंशपूंजी 5 लाख रुपये होने चाहिए । अधिक तम की कोई सीमा नहीं।

यह अपने आर्टिकल आफ एसोसिएशन में बताए नियम एवं शर्तों के अनुसार सभी कार्य करती है।

इसे अपनी लेखा पुस्तकें, वार्षिक प्रतिवेदन बनाना एवं संचालक मंडल की सभा कराना भी जरूरी होता है।

आकर अनुसार वर्गीकरण
(Size wise Classification)
कुटीर उद्योग, घरेलू उद्योग (CottageIndustries)

कुटीर एवं घरेलू उद्योग बहुत कम पैसों में परिवार की मदद से घर से ही शुरू किए जा सकते हैं। यदि ग्राम में शुरू किए जाते हैं तो ये ग्रामीण कुटीर उद्योग कहलाते हैं। यदि शहर में शुरू करने पर शहरी कुटीर उद्योग कहलाये

पूंजी मशीनों तथा कर्मचारियों की संख्या के आधार पर बिजनेस का वर्गीकरण।
सूक्ष्म उद्यम (Micro Enterprise)

ऐसे उद्योग जहां संयंत्र मशीनरी और उपकरणों में निवेश राशि ₹ एक करोड़ से अधिक नहीं है।

एवं कुल वार्षिक टर्नओवर राशि ₹ पांच करोड़ से अधिक नहीं है।

साथ ही कार्यरत कर्मचारियों की संख्या 1 से 9 है तक है। ये सूक्ष्म उद्यम की श्रेणी में आते हैं।

लघु उद्योग (Small Enterprise)

ऐसे उद्योग जहां  संयंत्र मशीनरी और उपकरणों में निवेश राशि ₹ दस करोड़ से अधिक नहीं है।

एवं कुल वार्षिक टर्नओवर राशि ₹ पचास करोड़ से अधिक नहीं है।

साथ ही कार्यरत कर्मचारियों की संख्या 10 से 49 है तक है। ये लघु उद्यम की श्रेणी में आते हैं।

मध्यम उद्योग (Medimum Enterprise)

ऐसे उद्योग जहां संयंत्र मशीनरी और उपकरणों में निवेश राशि ₹ पचास करोड़ से अधिक नहीं है।

एवं कुल वार्षिक टर्नओवर राशि ₹ दो सौ पचास करोड़ से अधिक नहीं है।

साथ ही कार्यरत कर्मचारियों की संख्या 50 से 249 है तक है। ये मध्यम उद्यम की श्रेणी में आते हैं।

व्यवसायिक संगठनों की संरचनाओं को विस्तार से जानने के लिए लेख अपने व्यावसायिक संगठन की संरचना का स्वरूप निर्धारित करें अवश्य पढ़ें

व्यवसाय का चयन किस तरह करें यह जानने के लिए अगला लेख पढ़ें

आशा करता हूँ व्यवसाय क्या है यह लेख आपको अवश्य पसंद आया होगा। आपके विचार कमेंट्स में लिखकर अवश्य बताएं।

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