जीएसटी क्या है? आइए जानते हैं इसे क्यों शुरू किया गया है ?

जीएसटी क्या है? आइए जानते हैं, इसे क्यों शुरू किया गया है?

 

जीएसटी क्या है? आइए जानते हैं इसे क्यों शुरू किया गया आज हमारे ब्लॉग पर हम इसके संबंध में विस्तार से चर्चा करने के लिए तैयार हैं।

यदि आप भी जानना चाहते हैं कि जीएसटी क्या है? तो इस लेख को अंत तक अवश्य पढें।

इस लेख में हम जानेंगे जीएसटी क्या है? जीएसटी की आवश्यकता क्यों महसूस हुई ? जीएसटी की विशेषताएं ? 

गूड्स एवंं सर्विसेज टैक्स का ढांचा (स्ट्रक्चर), जीएसटी की दरें, जीएसटी के लाभ क्या है?

जीएसटी इनपुट टैक्स क्रेडिट क्या है? जीएसटी पंजीयन किसके लिए अनिवार्य है ?

 जीएसटी पंजीकरण के लिए आवश्यक दस्तावेज, जीएसटी पंजीयन कैसे कराएं ?

जीएसटी में दंड प्रावधान ,जीएसटी रिटर्न दाखिल करना? जीएसटी परिषद का निर्माण!

प्रत्येक बिजनेसमेन को विवेकपूर्ण व्यावसायिक निर्णय लेने के लिए जीएसटी की संरचना को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए।

जीएसटी क्या है?  इस पोस्ट में, हम उन महत्वपूर्ण तत्वों पर प्रकाश डाल रहे हैं जिन्हें आपको एक उद्यमी के रूप में अवश्य जानना चाहिए:

आइए जानते हैं जीएसटी क्या है?

GST (जीएसटी) अंग्रेजी में (Goods & Services Tax) गूड्स एंड सर्विसेज टैक्स का संक्षिप्त नाम है।

हिन्दी में इसे वस्तु एवं सेवा कर (वसेक) कहते हैं। यह एक अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax) प्रणाली  है।

इसे माल और सेवा कर अधिनियम बनाकर संसद में 29 मार्च 2017 को पारित किया गया है। यह देश में 1जुलाई 2017 से प्रभावी है।

जीएसटी वस्तुओं और सेवाओं के निर्माण, या दोनों की आपूर्ति और उपभोग पर लगाया जाता है।

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जीएसटी क्या है? यह लेख जरूरत से ज्यादा बड़ा हो रहा है।  इसलिए इसे जीएसटी क्या है? पार्ट 1 समझेंं।जीएसटी क्या है? पार्ट् 2 का इंतजार करें

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जीएसटी वस्तु एवंं सेवा कर प्रणाली में हर मूल्यवर्धन पर बहु-स्तरीय कर उदग्रहण किया जाता है। यह एक व्यापक गंतव्य-आधारित टैक्स सिस्टम है।

आइए उपरोक्त बिन्दुओं को और अधिक गहराई से समझते हैं।

बहु-चरण या बहु-स्तरीय का मतलब”

कोई भी वस्तु निर्माण से लेकर अंतिम उपभोक्ता तक कई स्तरों/चरणों से होकर गुजरती है।

सुविधा के लिए हम इसे पांच चरणों/स्तरों में बांट रहे हैं। जो इस तरह हैं :-

पहला स्तर कच्चा माल खरीदना। दूसरा स्तर उत्पादन या निर्माण करना।

तीसरा स्तर वेअरहाउस एजेंट होलसेलर को बिकना।
चतुर्थ स्तर खुदरा विक्रेता को बिकना। पंचम स्तर अंतिम उपभोक्ता को बिकना।

इस तरह जीएसटी बहु-चरण या बहु-स्तरीय यानि सप्लाई चैन के प्रत्येक स्तर में लगाया जाता है।

मूल्य वर्धित उदग्रहण:

उत्पाद सेवा के मूल्य में निर्माण से लेकर अंतिम उपभोक्ता को बेचने तक प्रत्येक स्तर पर कुछ अतिरिक्त मूल्य जोड़ा जाता है।

हर स्तर पर अतिरिक्त जोड़ा गया मूल्य ही मूल्यसंवर्धन  कहलाता है।

वस्तुओं और सेवाओं के लेनदेन मूल्य में पैकिंग, अग्रेषण, परिवहन विक्रय व्ययआदि जैसे कई खर्च शामिल हैं।

इन वस्तुओं और सेवाओं पर लागू प्रोत्साहन भी लेनदेन मूल्य में समायोजित किए जाते हैं।

याद रखें कि जीएसटी लेनदेन मूल्य पर देय है।

यानि दो असंबंधित पक्षों के बीच माल या सेवाओं की आपूर्ति के लिए भुगतान की जाने वाली कीमत पर देय है।

बहु-चरण एवंं मूल्यसंवर्धन वसूली को इस काल्पनिक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए आप एक बर्तन मैन्युफैक्चरिंग कंपनी हैं।

बर्तन बनाने हेतु पहले चरण में आपने धातु खरीदा।  दूसरे चरण में धातु निर्माण उपरांत बर्तन बन गई। बर्तन बनने से धातु का मूल्य बढ़ गया।

तीसरे चरण में आपने इसे होलसेलर को बेच दिया। होलसेलर ने इसकी बढ़िया पैकिंग कर दी। पैकिंग के बाद बर्तन का मूल्य फिर बढ़ गया।

चौथे चरण में होलसेलर से बर्तन को खुदरा व्यापारी ने क्रय किया।

एवं बर्तन के मूल्य में अपने विक्रय व्यय जोड़ दिया बर्तन का मूल्य पुन: बढ़ गया।

इस तरह जीएसटी प्रत्येक चरण में यानि धातु खरीदने से बर्तन निर्माण पर होलसेलर पर खुदरा विक्रेता पर सभी स्तर पर अर्थात बहु स्तर पर लगेगा।

इसी तरह  निवेश से अंतिम उपभोक्ता के पास पंहुचने तक  बर्तन के मूल्य में हर बार जो मूल्य वृद्धि हुई है उस पर जीएसटी लगाया जाएगा।

इसे ही मूल्यसंवर्धित उद्ग्रहण (वसूली )कहते हैं।

गंतव्य-आधारित कर से आशय

निर्माण, उत्पादन और प्रदाय पर कर ना लेते हुए अंतिम उपभोक्ता से इसे एकत्र किया जाता है।

मान लीजिए बर्तन आपने महाराष्ट्र में निर्माण किया परंतु  यह मध्यप्रदेश में अंतिम उपभोक्ता को विक्रय किया गया।

चूंकि महाराष्ट्र में निर्माण हुआ है, इसका राजस्व महाराष्ट्र को मिलना चाहिए।

परंतु गंतव्य आधारित कर होने के कारण इसका राजस्व महाराष्ट्र को नहीं मिलेगा।

उत्ंपाद मध्यप्रदेश में अंतिम उपभोक्ता को बेचा जा रहा है।  जीएसटी बिक्री के अंतिम गंतव्य पर एकत्र किया जाता है।

इसलिए इसका राजस्व मध्यप्रदेश को प्राप्त होगा।

अब आप अच्छी तरह से समझ गए हैं कि जीएसटी क्या है?

जीएसटी की आवश्यकता क्यों महसूस हुई ?

देश में अप्रत्यक्ष करों के क्षेत्र में सुधारों की जरूरत एक लंबे समय से महसूस की जा रही थी।

क्योंकि कराधान प्रणाली की जटिलताओं तथा खामियों से सभी उद्योग, सरकार और नागरिक त्रस्त एवं परेशान थे।

सभी के लिए आसान एवं सुविधाजनक करप्रणाली की आवश्यकता थी।

पुरानी कर प्रणाली अनुसार निर्माता, थोक व्यापारी और खुदरा विक्रेता पर केंद्र एवं राज्य के 17 से अधिक कर वसूल किए जाते थे।

केंद्रीय उत्पाद शुल्क, कस्टम ड्यूटी, सीव्हीडी, विशेष अतिरिक्त शुल्क केंद्रीय, विक्रय कर, खरीद कर, वेट, सेवा कर, चुंगी, एन्ट्री टैक्स, लग्जरी कर, विक्रयकर,

लॉटरी जुआं सट्टा पर कर, मनोरंजन कर, प्रतिकारी शुल्क, विज्ञापन कर, स्टांप ड्यूटी, परिवहन कर आदि।

ये सब टैक्स व्यवसायियों के साथ साथ उपभोक्ताओं पर भी बोझ थे, क्योंकि इन सभी की कीमतें अंत में उन्हें ही चुकाना होता था।

करों की दरों में असमानता के कारण एक ही वस्तु या सेवा की कीमत भिन्न-भिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न होती थीं।

ग्राहकों को यह मालूम नहीं हो पाता था कि उन्होंने किसी वस्तु या सेवा विशेष पर कुल कितना कर दिया है।

कभी कभी तो कर की राशि मूल्य का 35 % तक, कुछ मामलों में तो यह 50% तक भी वसूली जाती थी।

राज्यों द्वारा मनचाहे करारोपण से व्यवसायियों के लिए अंतरराज्यीय व्यवसाय करना असुविधाजनक होता था।

इन सभी समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए एक नई आसान पारदर्शी कर व्यवस्था की जरूरत थी।

इसलिए सभी अप्रत्यक्ष करों की जगह पूरे देश में समान एवं सरल कर प्रणाली लागू करने के उद्देश्य से जीएसटी  को शुरू किया गया है।

अप्रत्यक्ष करों के स्थान पर अब केवल केंद्रीय जीएसटी, राज्य जीएसटी और एकीकृत जीएसटी (वस्तु एवंं सेवा की प्रत्येक अंतर-राज्य आपूर्ति पर) लगाया जाता है।

इससे देश में एकीकृत साझा बाजार निर्मित हो गया है।

जीएसटी  हमारे उत्पादों को घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धी बना देगा। इससे आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा । तथा निर्यात में भी वृद्धि होगी।

जीएसटी के द्वारा सभी प्रकार के उद्योगों और व्यवसायों को कर दायरे में लाया जाएगा। इसीके साथ करदाता आधार में भी वृद्धि की जा सकेगी।

इस तरह जीएसटी उत्पादक, व्यवसायी, उपभोक्ता, केंद्र एवं राज्य सरकार सभी के लिए सुविधाजनक हो गया है।

जीएसटी की विशेषताएं

कर भुगतान में पारदर्शिता: जीएसटी मैन्युफैक्चरिंग की जगह उपभोग पर लगाया जाता है। इसका भुगतान वस्तु या सेवा के उपभोक्ता को देना होता है।

यद्दपि इसकी वसूली की जिम्मेदारी उत्पाद या सेवा देने  वाले व्यवसायी की ही होती है।

विक्रेता द्वारा ग्राहकों को उत्पाद या सेवा प्रदान करने पर जीएसटी का विवरण अलग लिखकर बताना होगा। खरीददार जीएसटी को मिलाकर पूरा पैसा देगा।

उसे हमेशा यह मालूम होता रहेगा कि किसी उत्पाद पर कुल कितना टैक्स लगा है। सरकार ने सबकी दरें पहले से तय कर दी है।

जटिलता एवं बाधाओं से छुटकारा:

एक राष्ट्र एक नीति के तहत यह एक एकल एकीकृत प्रणाली है। जिसे पूरे देश में लागू किया गया है।

यानी देश के किसी भी कोने में रह रहे उपभोक्ता को हर उत्पाद पर एक जैसा कर चुकाना होता है।

वस्तु एवंं सेवा कर एक संयुक्त कर है, जो केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा पूर्व में लगाए जा रहे सभी अप्रत्यक्ष करों की जगह लगाया जाता है।

यह  करों के कैस्केडिंग प्रभाव को घटाकर राज्यों के बीच आर्थिक बाधाओं को भी दूर करता है

जीएसटी विक्रय पर नहीं लगाकर आपूर्ति पर लगाया जाता है। इसलिए स्टॉक लेना, कन्सेशन और फ्री भी जीएसटी नेटवर्क की परिधि में आते हैं।

एक ही वैधानिक इकाई की दो स्थापनाओं के बीच टैक्स लगाया जाएगा। एजेंट और प्रिंसिपल के बीच माल प्रदाय सप्लाई कर योग्य होती है

मालिक द्वारा कर्मचारियों को ₹ 50000 से अधिक दिए गए ‘उपहार’ भी कर योग्य हैं।

किए गए सभी आयात राज्य के अंदर प्रदाय के रूप में IGST माने जाते हैं। सभी निर्यात शून्य रेटेड होंते हैं।

सरल एवं पारदर्शी अनुपालन हेतु आनलाइन प्रक्रिया की शुरुआत:

जीएसटी नेटवर्क (जीएसटीएन) के द्वारा पूरी प्रक्रिया को सरल, सटीक और गति देनेके लिए जीएसटी पोर्टल लॉन्च किया गया है।

इस ऑनलाइन पोर्टल पर पूरी प्रक्रिया डिजिटल और तकनीकी रूप से संचालित है।

कर प्रबंधन के लिए जीएसटी सुविधा केंद्र, जीएसपी, एएसपी स्थापित किए गए हैं।

ये पंजीकरण, रिटर्न फाइलिंग, भुगतान, धनवापसी के लिए आवेदन और नोटिस पर प्रतिक्रिया जैसे सभी कार्य में करदाताओं की सहायता करते हैं।

 कदाचार पर बेहतर नियंत्रण : सुदृढ़  सूचना प्रौद्योगिकी एवं बुनियादी ढांचे के कारण जीएसटी से बेहतर कर अनुपालन परिणाम प्राप्‍त होंगे।

मूल्‍य संवर्धन की श्रृंखला के तहत  इनपुट टैक्स क्रेडिट सिस्टम से कदाचार पर नियंत्रण किया जा सकेगा। 

छोटे व्यवसायों के लिए संरचना योजना:

लघु उद्यमियों को गूड्स एवं सर्विसेज टैक्स संरचना योजना के साथ प्रदान किया जाता है।

हरेक छोटा-व्यवसाय जिसका वार्षिक टर्नओवर ₹40 लाख  से ₹75 लाख है, वह कंपोजिशन स्कीम का विकल्प ले सकता है।

इस योजना के द्वारा, छोटे व्यवसाय कम दरों पर करों का भुगतान कर सकते हैं। इससे उन पर कर अनुपालन का बोझ और कम हो जावेगा।

गूड्स एवंं सर्विसेज टैक्स का ढांचा  (स्ट्रक्चर)

देश में जीएसटी के तहत दो मुख्य करों का भुगतान लिया जाता है। पहला केंद्रीय जीएसटी (सीजीएसटी) दूसरा राज्य स्तरीय जीएसटी (एसजीएसटी )

सुविधा के लिए जीएसटी के चार प्रकार बनाए गए हैं:

1. सीजीएसटी (CGST) सेन्ट्रल गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स। Central Goods and Services Tax

इसे केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर भी कहते हैं। यह राज्य के अंदर दो पक्षों के बीच वस्तु एवंं सेवा के लेन-देन पर लगाया जाता है।

यह टैक्स केंद्र सरकार को देना पड़ता है। इसे राज्यातंरिक कर भी कहते हैं।

2. एसजीएसटी ((SGST) स्टेट गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स State Goods and Service Tax

इसे राज्यीय वस्तु एवं सेवा कर भी कहते हैं।

जब राज्य के अंदर दो पक्षों के बीच वस्तु एवंं सेवा का लेन-देन होने पर इसे लगाया जाता है।

यह टैक्स राज्य सरकार को देना पड़ता है। इसे राज्यातंरिक कर भी कहते हैं।

3. यूटीजीएसटी (UTGST):यूनियन टेरिटरी गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (Union territory Goods and Services Tax)

केन्द्र शासित प्रदेशों में में दो पक्षों के बीच वस्तु एवं सेवाओं के लेन-देन पर लगाया जाता हैं।

ये कर केंद्र शासित प्रदेश सरकार द्वारा एकत्रित किया जाता हैं।

यूनियन टेरिटरीज में टोटल जीएसटी सीजीएसटी एवं यूटीजीएसटी का योग है।

4. इन्टीग्रेटेड गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (Intigrated Goods and Services Tex)
आईजीएसटी (IGST) :

वस्तु या सेवा का लेन-देन अलग-अलग राजयों के दो पक्षों के बीच हो रहा हो तब यह टैक्स लगाया जाता है।  इसे केंद्र सरकार को देना पड़ता है।

महत्वपूर्ण: राज्य के अंदर होने वाले प्रत्येक लेन-देन पर आपको सीजीएसटी एवं एसजीएसटी दोनों करों का भुगतान करना होगा।

दो राज्यों के बीच लेन-देन की स्थिति में सिर्फ एक टैक्स देना पड़ेगा IGST वह भी सिर्फ केंद्र सरकार को।

इस आईजीएसटी से बाद में उपभोग करने वाले राज्य को हिस्सा दिया जाता है।

एसजीएसटी यूनियन टेरीटरीज पर लागू नहीं होता है।  क्योंकि इसके लिए विधायिका की जरूरत होती है।

यूनियन टेरीटरीज दिल्ली और पांडिचेरी में राज्य वस्तु एवंं सेवा कर है, क्योंकि उनके पास अपनी विधायिका है।

जीएसटी की दरें

जीएसटी की दरों को मुख्य पांच श्रेणियों में  बांटा गया है। वे इस तरह हैं। 1) 0%  2) 5%  3) 12%  4)18%  5) 28%।

समस्त वस्तुओं और सेवाओं के प्रदाय पर गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स लगाया जाता है।

कुछ पदार्थों को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है।
जैसे विद्दुत अल्कोहल पेट्रोलियम आदि

विलासिता की वस्तुओं पर कर की दरें अधिक रखी गई हैं। कम मूल्य की ज्यादा उपयोग में आने वाली आवश्यक वस्तुओं पर जीएसटी की दरें शून्य या कम रखी गई हैं।

इसी तरह शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को इससे मुक्त रखा गया है।

फल एवं सब्जियां, आटा, बेसन,दूध, लस्सी, दही, शहद,   ब्रेड, प्रसाद, नमक, बिंदी, सिंदूर, स्टांप,

चूड़ियाँ, न्यायिक दस्तावेज, छपी पुस्तकें, ताजा मीट, समाचार पत्र,मछली, चिकन, अंडा, और हैंडलूम आदि आवश्यक वस्तुओं पर जीएसटी 0% लगेगा।

जीएसटी के लाभ क्या है?

जीएसटी के माध्यम से सभी अप्रत्यक्ष करों को संयुक्त करके एक साथ लाया गया है।

सेवा और वस्तु व्यापार के लिए कराधान को सरल बना दिया गया है।

जीएसटी देश में करों की संरचना में समानता लाने और अतीत में लगाए गए करों के व्यापक प्रभाव को ख़त्म करने वाला सबसे बड़ा कर-सुधार है।

जीएसटी लागू करने से कर प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ गई है।

यह सरकार, कारोबारियों और उपभोक्ताओं सभी के लिए फायदेमंद है।

सरकार ने एक कर व्यवस्था सभी की सुविधाओं को ध्यान मे रख कर की है तो सभी को उसका पालन भी करना चाहिये।

जीएसटी एक ऐसा अप्रत्यक्ष कर है, जिसने भारत को एक एकीकृत आम बाजार बना दिया है, जो केवल प्रत्येक चरण में मूल्यवर्धन पर लगाया जाता है।

जीएसटी हर वर्ग के लिए फायदेमंद  है।

 आम उपभोक्ता के  लिए

वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर तरह-तरह के कर खत्म होने से एवं कर के उपर कर खत्म होने से वस्तुओं की लागत में अनावश्यक बढोतरी नहीं हो रही है।

पारदर्शी कर अनुपात से वस्तुओं के दाम भी ज्यादा नहीं बढ़ते हैं। आम उपभोक्ताओं के लिए यह फायदेमंद है।

आम जरूरत की चीजों पर कर की दरें कम लगाए जाने से आम आदमी के ज्यादा काम आने वाली चीजें सस्ते में उपलब्ध हो रही हैं।

जनता के बहुत बड़े वर्ग को इनका लाभ मिल रहा है।

बाजार का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा जीएसटी के दायरे में आने से सरकारी आय बढ़ेगी। जिससे स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन जैसी जनसुविधाएं भी अधिक विकसित होंगी।

 उद्यमियों के लिए

हर राज्य में करों की संरचना भिन्न भिन्न होने से उद्यमियों के लिए उन्हें समझना कठिन होता था।

तरह-तरह के कर अलग से बोझ बढाते थे। यह समस्या अब नहीं रहेगी।

नियमों के सरलीकरण से अधिकारी-कर्मचारी अनुचित लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।

जिससे उद्यमियों को इन झंझटों से भी छुटकारा मिल गया है ।

इस कारण उद्यम तेजी से बढ़ेंगे और अधिक फायदा भी होगा।

देश में एक मजबूत और व्यापक आईटी प्रणाली के द्वारा जीएसटी प्रणाली संचालित की जावेगी।

सभी कर-दाता सेवाएं जैसे पंजीकरण, रिटर्न, भुगतान आदि ऑनलाइन उपलब्ध होंगे।

इससे अनुपालन आसान और पारदर्शी बन जाएगा।

सारे दस्तावेज ऑनलाइन होने से दस्तावेजों को तोड – मरोडकर पेश नहीं किया जा सकेगा।

किसी तरह की गल्ती होने पर या गुम जाने की स्थिति में उन्हें आसानी से आनलाइन सुधारा जा सकेगा। इससे दफ्तरों के अनावश्यक चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।

जीएसटी के प्रयासों द्वारा अप्रत्यक्ष कर की दरें और संरचनाएं देश भर में एक समान होने से व्यापार करना  आसान हो गया है ।

कैस्केडिंग प्रभाव के हटने से व्यवसाय करने की छिपी लागत कम हो गई है।

व्यापार करने की लेन-देन लागत में कमी से व्यापार और उद्योग के बीच एक बेहतर प्रतिस्पर्धा निर्मित हो रही है।

जीएसटी के प्रमुख कर सुधारों के फलस्वरूप अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में टक्कर देने लायक माल बन रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय वस्तुओं और सेवाओं की प्रतिस्पर्धा बढ़ने से भारतीय निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।

 केंद्र और राज्य सरकारों के लिए:

केंद्र एवंं राज्य स्तर पर अनेक अप्रत्यक्ष करों को जीएसटी द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया  गया है।

इससे जीएसटी प्रशासन करना सरल एवं कम खर्चीला हो गया है।

जीएसटी में बेहतर आईटी अनुपालन होता है इस कारण अधिकारियों कर्मचारियों के लिए प्रशासन संभालना सुविधाजनक  भी हो गया है।

इनपुट टैक्स क्रेडिट के कारण, उद्यमी कर अनुपालन हेतु प्रोत्साहित रहते हैं। इससे रिसाव पर बेहतर नियंत्रण रखा जाना संभव हो गया है।

इनपुट टैक्स क्रेडिट लेने के लिए निर्माण से बिक्री तक की पूरी चैन को दिखाना जरूरी होता है।

इसलिए करचोरी के उद्देश्य से चैन में छुपाये जाने वाले कार्य छुपाये नहीं जा सकेंगे। इससे करचोरी पर लगाम लगेगी। तथा सरकारी राजस्व भी बढ़ेगा।

प्रत्येक चरण में खरीदी और बिक्री की रसीदों का मिलान किया जाएगा। तभी उद्यमियों को पहले  के चरण में जमा किये गये टैक्स क्रेडिट का फायदा मिल पाएगा।

चूंकि इस चेन में सभी को बिल देना एवं बाद में उसकी रसीद पेश करना जरूरी होगा, इससे बाजार पूरी तरह से लेखांकित रहेगा।

इससे कालाबाजारी पर भी अंंकुश लगाया जा सकेगा।

जीएसटी के आने से सभी राज्यों में उत्पादों की कीमतें एक समान हो जाएंगी।

इससे कीमतों की असमानता के कारण अड़ोस पड़ोस के राज्यों के सीमावर्ती जिलों मे उस सामान की तस्करी पर रोक लग जाएगी।

वित्तीय वर्ष में GST के लिए मुझे कितने रिटर्न दाखिल करने की आवश्यकता है?

जीएसटी के तहत रिटर्न फाइलिंग आपके व्यवसाय की प्रकृति और आपके द्वारा चुने गए पंजीकरण के प्रकार पर निर्भर करती है।

यदि आप जीएसटी के तहत सामान्य करदाता हैं, तो आप एक वित्तीय वर्ष में कुल सैंतीस रिटर्न दाखिल करने के लिए उत्तरदायी हैं।

एक महीने में तीन रिटर्न और एक वार्षिक रिटर्न।

व्यावहारिक रूप से केवल 12 मासिक रिटर्न और 1 वार्षिक रिटर्न जीएसटी में दाखिल किए जाने की आवश्यकता है।

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 जीएसटी इनपुट टैक्स क्रेडिट क्या है? 

इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) सिस्टम का मतलब आंतिम चरण पर टैक्स लगने से पहले जहां जहां टैक्स जमा किया गया है, उसको वापस लेने की व्यवस्था।

यदि आप अंतिम या वास्त​विक उपभोक्ता नहीं हैं एवं पहले के किसी चरण में आपने जीएसटी जमा किया है तो वह आपके खाते में वापस हो जाएगा।

एक उत्पाद के निर्माण से लेकर उपभोक्ता तक पहुंचने में पूरी चेन शामिल रहती है। उत्पाद कई बार खरीदा बेचा जाता है।

इस सप्लाई चेन में हुई प्रत्येक खरीद बिक्री पर तयशुदा कर देना होता है।

परन्तु टैक्स क्रेडिट सिस्टम के अनुसार  सप्लाई चेन का हर अगला खरीदार अपने से पहले वाले विक्रेता के द्वारा दिए गए टैक्स को वापस प्राप्त कर लेता है।

इस कारण उत्पाद महंगा नहीं हो पाता।

प्रति माह जीएसटी रिटर्न भरते समय आप टैक्स क्रेडिट सिस्टम  के माध्यम से अपना जीएसटी समायोजित  करा सकते हैं।

आइए इसे निम्न उदाहरण के द्वारा समझते हैं।

आप बर्तन निर्माता हैं। आपने बर्तन निर्माण के लिए तांबा खरीदा। जिसका मूल्य ₹100 है।

यदि धातु पर जीएसटी की दर 10% है, तो आपको धातु खरीदी के लिए ₹110 का भुगतान करना होगा।

आपने ₹110 का माल खरीदा यानि ₹10 टैक्स जमा किया। बर्तन निर्माण होने पर आप उसे ₹180 में बेचते हैं, तो उसपर 10 % की दर से कर ₹18 बनता है।

रिटर्न फाइल करते समय आपको बर्तन विक्रय ₹180 पर जीएसटी  ₹18  की देनदारी बनती है।

यहां आपको  ₹10 का इनपुट क्रेडिट वापसी मिलेगी। जिसे आपने माल खरीदी करते समय जमा किया था।

अब हम इसी उदाहरण से करों के व्यापक प्रभाव एवं जीएसटी के पूर्व प्रचलित कर प्रणाली को समझेंगे।

जीएसटी प्रणाली के अंतर्गत इनपुट क्रेडिट वापसी।

आपने बर्तन को थोक व्यापारी को ₹198 में  बेच दिया। वह  बर्तन की पैकिंग कर उस पर व्यय + लाभ =₹42 जोड़ता है।

यहां बर्तन का मूल्य संवर्धन हो रहा है।बर्तन का लागत मूल्य अब ₹240 हो गया है ।

इसके ऊपर, उसे 10% कर का भुगतान करना है।

इस तरह, बर्तन का विक्रय मूल्य अब हो जाता है
(198 + 42 =) 240 + 10% कर =₹264

अब, फुटकर विक्रेता थोक व्यापारी से बर्तन खरीदने के लिए ₹264 का भुगतान करता है क्योंकि कर दायित्व उसके पास आ गया है ।

रिटेलर बर्तन में परिवहन+विक्रय व्यय+लाभ+ जोड़ता है।  जब वह ऐसा करता है, तो वह फिर से मूल्य जोड़ रहा है।

मान लीजिए उसने ₹26 अतिरिक्त मूल्य जोड़ा है ।

इस चरण में जब वह बर्तन बेचता है, अंतिम लागत पर  सरकार को वेट देना होगा।

इसके साथ ही उसे सरकार को देय वेट जोड़ना होगा।  बर्तन की  लागत अब ₹319 हो गई है।  वह इस तरह है:

लागत = ₹264 +  मूल्यसंवर्धन = ₹ 26+ 10% कर = रु 264 + 26+29 =  319 रुपये

उपभोक्ता को इस  बर्तन के लिए ₹329 का भुगतान करना होगा।  जिसकी कीमत मूल रूप से केवल ₹248 (180 + 42 + 26 रुपये) है।

ऐसा इसलिए हुआ कि प्रत्येक चरण में विक्रय पर कर पारित किया गया  है। और अंतिम दायित्व उपभोक्ता के पास आ गया है।

इसे ही करों का व्यापक प्रभाव कहा जाता है जहां टैक्स के ऊपर टैक्स का भुगतान किया जाता है और उत्पाद का मूल्य हर बार बढ़ता जाता है।

कार्य                      लागत          10% कर   कुल
धातु खरीदी @100    100           10          110
उत्पादन     @ 80      180           18           198
मूल्य जोड़ें  @ 42      240          24           264
मूल्य जोड़ें  @ 26      290          29           319

कुल                         290                           319

इस उदाहरण में, जब थोक व्यापारी आपसे बर्तन ₹198  मूल्य पर खरीदता है, एवं उसके द्वारा किए व्यय ₹42 मूल्य में और जोड़ता लागत मूल्य ₹240 हो जाता है।

अब उसे इस कीमत का 10% सरकार को कर के रूप में (₹240 का 10% =) ₹ 24 देना है क्योंकि उसके पास कर देयता दे दी गई है।

परंतु वह आपको पहले ही कर के रूप में एक भुगतान ₹18 दे चुका है।

इसलिए वह सरकार को टैक्स के लिए ₹24 का भुगतान नहीं करेगा। वह केवल ₹6 का भुगतान करेगा।

क्योंकि उसे जीएसटी नियमानुसार ₹18 इनपुट क्रेडिट प्राप्त करने की पात्रता है।

उसके द्वारा सरकार को ₹6 का भुगतान करते हुए अपनी कर देयता रिटेलर को दे दी गई है।

फुटकर विक्रेता उस बर्तन खरीदने के लिए (240+ 24=) ₹264 का भुगतान करेगा।

अगले चरण में रिटेलर ने ₹26 का व्यय उसकी लागत कीमत ₹264 में जोड़ दिया है। अब बर्तन की कीमत ₹290 हो गई है।

उसे सरकार को 10% कर का भुगतान भी देना है। वह  कर दायित्व कंज्यूमर को पारित कर देता है ।

उसके पास इनपुट क्रेडिट भी है क्योंकि उसने थोक विक्रेता को टैक्स के रूप में ₹24 का भुगतान किया है।

इसलिए, अब वह अपनी कर दायित्व (290*10% = ) = ₹29  से ₹24 कम कर देता है और उसे सरकार को केवल ₹5 का भुगतान करना पड़ता है।

अब ग्राहक को वह यह बर्तन (180+68+25 =) ₹273 में बेच सकता है।

कार्य                   लागत  10% कर वा देय   कुल
धातु खरीदी @100 100       10       10    110
उत्पादन     @ 80   180       18         8    198
मूल्य जोड़ें  @ 42   222       22         4    226
मूल्य जोड़ें  @ 26   248       25         3    273

कुल                     248                   25    273

अंत में, हर बार जब कोई व्यक्ति इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा करने में सक्षम होता है, तो उसके लिए बिक्री मूल्य कम हो जाता है।

उसके उत्पाद पर कम कर दायित्व के कारण  लागत मूल्य भी कम हो जाता है।

बरतन का अंतिम मूल्य भी ₹319से  ₹273  हो गया, इस प्रकार अंतिम उपभोक्ता पर कर का बोझ कम हो गया।

यदि आपने जीएसटी पंजीयन कराया है तो आप अपनी खरीद पर भुगतान किए गए कर के लिए इनपुट क्रेडिट का दावा करने के पात्र हैं।

इसके लिए आपके पास पिछली खरीदों के सभी चालान होना जरुरी है।

एक खुदरा विक्रेता को इनपुट क्रेडिट प्राप्त करने के लिए, श्रृंखला के सभी पिछले एजेंटों- थोक व्यापारी, निर्माता और आपूर्तिकर्ता – को जीएसटी का अनुपालन करना चाहिए।

जीएसटी प्रणाली यह सुनिश्चित करती है कि हर चरण में कर एकत्र किया जाए।

जीएसटी प्रत्येक राज्य के लिए आवश्यक होगा। करदाता राज्य में अपने अलग-अलग बिजनेस वर्टिकल (व्यापार ऊर्ध्वाधर) के लिए अलग-अलग पंजीयन प्राप्त कर सकते हैं।

जीएसटी पंजीयन किसके लिए अनिवार्य है ? 

जीएसटी सभी व्यक्तियों एवंं उद्यमों पर लागू है।

उद्यमों में  व्यापार, वाणिज्य, निर्माण, पेशे, व्यवसाय या कोई अन्य समान कार्यवाही, इसमें प्रसार एवंं संभावनाएं शामिल हैं।

माल एवं सेवाओं की आपूर्ति जो बिजनेस प्रारंभ करने के समय अथवा बिजनेस बंद करने के वक्त की जाती है को भी शामिल किया गया है।

व्यक्तियों में व्यक्ति, एचयूएफ(हिंदू अविभाजित परिवार) कंपनी, फर्म, एलएलपी (सीमित दायित्व भागीदारी), ओपीसी, सहकारी  सोसाइटी, ट्रस्ट आदि।

जीएसटी कृषक विशेषज्ञों पर लागू नहीं होता है।

इसमें फसलें, घास या बगीचे, फूलों की खेती, बागवानी, रेशम उत्पादन, शामिल हैं।

डेयरी फार्मिंग (दूध का व्यापार) मुर्गी पालन,स्टॉक प्रजनन (पशु-अभिजननक्षेत्र), फल या संगमरमर पौधों का पालन शामिल नहीं है।

1.  व्यवसायी जो पूर्व से ही वेट, सर्विस टैक्स अधिनियम
के अंतर्गत रजिस्टर्ड हों।

2.  व्यवसायी जिनका टर्नओवर ₹40 लाख से ज्यादा है।
पहाड़ी इलाकों (उत्तर पूर्व के कुछ राज्य) के उद्यमियों
के लिए यह सीमा ₹20 लाख तय की गई है।

1अप्रैल2019 के पहले यह सीमा सभी के लिए ₹20
लाख तथा उत्तर पूर्व राज्यों के लिए ₹10लाख थी

3. अनिवासी भारतीयों कर योग्य व्यक्ति आपूर्ति एजेंट
इनपुट सर्विस डिस्ट्रीब्यूटर।

4. रिवर्स चार्ज के तहत टैक्स जमा करनेवाले व्यक्ति एवं
वे व्यक्ति जो ईकॉमर्स सर्विसेस प्रदान करते हैं।

 जीएसटी पंजीयन कैसे कराएं ?

गुड्स एंड सर्विस टैक्स का लाभ लेने के लिए,आपको जीएसटी रजिस्ट्रेशन करवाना होगा। आइए समझते हैं,  जीएसटी पंजीकरण कैसे किया जाता है।

जीएसटी पंजीकरण ऑनलाइन जीएसटीएन पोर्टल (GSTN Portal) पर नि:शुल्क है। इसे कोई भी व्यक्ति स्वयं ही कर सकता हैं|

आप भी अपने बिजनेस का पंजीयन स्वयं फॉर्म भर कर आवश्यक दस्तावेज जमा कर सकते हैं।

जीएसटी पंजीयन के लिए सरकार द्वारा कोई शुल्क या फीस नहीं ली जाती है।

आप चाहें तो इस कार्य को किसी प्रोफेशनल व्यक्ति  अथवा फर्म वकील या सीए से भी करवा सकते हैं।

वे काम के आकार के अनुसार उनके द्वारा निर्धारित माप दंडों के हिसाब से शुल्क लेते हैं। जो सबका अपना अलग-अलग होता है।

जीएसटी पंजीयन के लिए, आपके पास अपना एक वैध मोबाइल नंबर, ईमेल पता और पैन नंबर (स्थायी खाता संख्या) होना चाहिये।

आवश्यक दस्तावेज जिन्हें रजिस्ट्रेशन करते समय अटेच किया जाना है।

करदाता का संविधान, व्यावसायिक पते का प्रमाण, बैंक खाता विवरण, प्राधिकरण फार्म एवं फोटो।

चरण दर चरण पंजीयन प्रक्रिया।

प्रथम चरण: ब्राउज़र में www.gst.gov.in इस वेब एड्रेस को ओपन करें।

आपके स्क्रीन पर जो पृष्ठ खुलेगा उसमें टैक्सपेयर्स (नार्मल/टीडीएस/टीसीएस) में रजिस्टर्ड नाउ पर  क्लिक करें।

अब आपके पास नए पृष्ठ रजिसट्रेशन पर दो विकल्प उपलब्ध हैं। न्यु रजिस्ट्रेशन एवं टेम्प्रेरी रेफरेन्स नंबर ।

बाय डिफाल्ट न्यु रजिस्ट्रेशन विकल्प सिलेक्टेड है।

द्वितीय चरण: पहले तीन विकल्प ड्रापडाउन मेन्यु से  चयन करना है।

(1) I am a …(टैक्सपेयर) विकल्प का चयन करें। (2) राज्य एवं (3) जिला अपना राज्य एवं जिला चयन करें।

पैनकार्ड अनुसार जानकारी और नंबर लिखें। मोबाइल नंबर, ईमेल एड्रेस दर्ज करें।

चित्र में बताए अनुसार टेक्स्ट लिखकर प्रोसीड पर क्लिक करें।

आपके द्वारा दर्ज किए गए मोबाइल नंबर एवंं ईमेल आई डी दोनों पर अलग-अलग ओटीपी प्राप्त होंगे। ओटीपी केवल 10 मिनट के लिए वैध होते है।

आवश्यकता हो, तो आप ओटीपी को दोबारा भी प्राप्त कर सकते हैं।

अब आपके स्क्रीन पर ओटीपी वेरिफिकेशन पृष्ठ दिखाई देगा।

तृतीय चरण:आपको मोबाइल ओटीपी फील्ड में मोबाइल  पर प्राप्त ओटीपी एवंं ईमेल आइ डी फील्ड पर  ईमेल पर प्राप्त हुए ओटीपी दर्ज करना है

इसके बाद प्रोसीड पर क्लिक करना है।

नए पृष्ठ परआपको सिस्टम जनरेटेड संदेश दिखाई देगा। आपने रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया का पार्ट ए सफलतापूर्वक सबमिट कर दिया है।

इस टेम्प्रेरी रेफरेन्स नंबर (टीआएन) अस्थायी पंजीयन संख्या का उपयोग करते हुए 15 दिन की अवधि में आवेदन का पार्ट बी सबमिट कर सकते हैं।

सथ मे15 दिन बाद की एक्सपायरी तिथि दर्शाइ होती है।

पंजीकरण प्रक्रिया पूरी होने तक यह बहुत उपयोगी होता है। यह आपके मोबाइल एवं ईमेल पर भी प्राप्त होगा।

आप इस टीआरएन के द्वारा फिर से लागिन भी कर सकते हैं।

इसे आपको नए जीएसटी पंजीकरण प्रक्रिया के भाग ‘बी’ को जारी रखने के लिए उपयोग करना है।

आप होम पेज पर जाकर टैक्सपेयर में “रजिस्टर नाऊ” पर क्लिक करके भी इस पेज तक पहुँच सकते हैं|

यदि  आप पंजीयन प्रक्रिया चालू रखना चाहते हैं तो पृष्ठ में नीचे दिए गए प्रोसीड पर क्लिक करें।

नए पृष्ठ पर आपके सामने न्यु रजिसट्रेशन एवं  टेम्प्रेरी  रेफरेंस नंबर बाए डिफाल्ट सिलेक्टेड उपलब्ध हो जाएंगे।

चतुर्थ चरण यहां आपको  टीआएन दर्ज करना है तथा चित्र अनुसार टेक्स्ट भरकर प्रोसीड पर क्लिक करना है।

क्लिक करने पर आपके मोबाइल एवम् ईमेल पर एक जैसे ओटीपी आएंगे|

यदिओटीपी इनवेलीड का मैसेज आता है तो ओटीपी फिर से मंगाने का विकल्प उपयोग किया जा सकता है।
ओटीपी भरकर प्रोसीड पर क्लिक करें।

आपको स्क्रीन पर माय सेव्ड अप्लिकेशन पृष्ठ दिखाई देगा।  जब तक आवेदन सबमिट नहीं किया जाता उसकी स्थिति ड्राफ्ट दिखाई देती रहती है।

आवेदन सब्मिट होने पर इसकी स्थिति वेलिडशन के लिए पेंडिंग दिखाई देने लगेगी।

पंचम चरण इसी पृष्ठ पर दायीं तरफ दिखाई दे रहे एक्शन के कालम में एडिट के विकल्प को क्लिक करना है

क्लिक करने पर न्यू रजिस्ट्रेशन का फॉर्म खुलेगा, जिसमे एप्लीकेशन टाइप, ड्यू डेट ऑफ कम्पलीट,लास्ट मोडिफाइड प्रोफाइल दिया होगा।

इसमें 10 विभाग हैं। जिन्हें  निम्नानुसार दर्ज करना होगा।

i. बिजनेस डिटेलस : यहां आपको व्यवसाय से संबंधित पूरी जानकारी, जिसमें ट्रेड का नाम, बिजनेस का  संविधान से लेकर जिले तक की पूरी जानकारी देना है।

इसी के साथ व्यापार किस दिनांक से शुरू हुआ एवंं पंजीयन क्यों कराना चाहते हैं ? कारण लिखकर कंटिन्यू बटन दबाएंगे।

ii. प्रमोटर या पार्टनर्स: यहां पर सभी प्रवर्तकों या पार्टनर्स की व्यक्तिगत जानकारी, पहचान तथा निवास का पता दर्ज करके संबंधित दस्तावेज अटेच करना है।

iii. अथराइज्ड सिगनेटरी: ऑथोराइस सिगनेटरी अलग हो, तो उसके अधिकार पत्र के साथ उसका पूरा विवरण उसकी पूरी व्यक्तिगत जानकारी, पहचान तथा निवास का पता दर्ज करके संबंधित दस्तावेज अटेच करना होता है

iv.अथराइज्ड रेप्रेजेंटेटिव : यदि कोई अधिकृत प्रतिनिधि है, तो उसका विवरण दर्ज करना है।

v. प्रिंसिपल प्लेस ऑफ बिजनेस: जहां व्यवसाय किया जा रहा है उसके पते के साथ संबंधित सभी जानकारी भी दर्ज करना है। एवंं दस्तावेज अटेच करना है।

यह सबसे महत्वपूर्ण जानकारी है। इसमें  व्यवसाय की प्रकृति क्या है, इसका चुनाव करना है।

अंत में यदि बिजनेस एक से अधिक स्थान पर किया जा रहा है तो उसका चयन करना है.

vi.एडीशनल प्लेस ऑफ बिजनेस: यदि अन्य स्थानों पर गोदाम, वेयरहाउस आदि हैं तो उनके विवरण देकर दस्तावेज अटैच करना है।

vii.गुड्स एंड सर्विसेज:  वस्तु या सेवा जिसका व्यवसाय किया जा रहा है, एचएसएन कोड के साथ पूरी जानकारी  देना है।

viii. बैंक अकाउंट: यहाँ पर बैंक का विवरण दर्ज करना है। तथा संबंधित दस्तावेज अटैच करना है।

ix. स्टेट स्पेसिफिक इन्फोर्मेशन: पूर्व से किसी अन्य राज्य में पंजीकृत हैं तो पजीयन क्रमांक लिखेंगे।

x. वेरीफिकेशन: आपको सत्यापित करना है कि आपके द्वारा दिए गए सभी विवरण सही है तथा आपको उनकी पूरी जानकारी है।

ऑथोराइसड सिगनेटरी का चयन करें। स्थान दर्ज करें।

अपना जीएसटी एप्लिकेशन सत्यापित करें और सबमिट करें

डीएससी, ई-हस्ताक्षर, ईवीसी किसी एक सत्यापन विधि को चुनकर अपनी आवेदन जमा कर सकते हैं:

प्रक्रिया पूरी होने के बाद एक आवेदन संदर्भ संख्या (एआरएन)  जनरेट होता है।

यह आपके मोबाइल नंबर एवं  ईमेल आईडी पर भेज दिया जाता है।

इससे आप अपने आवेदन की स्थिति  का पता लगा सकते हैं। जीएसटी नंबर हमारे ई-मेल पर भेजा जाता है।

इसमे एक पासवर्ड भी दिया होता है, जिसके द्वारा हम  नया यूजर नेम तथा स्वयं का पासवर्ड भी बना सकते हैं।

 जीएसटी पंजीकरण के लिए आवश्यक दस्तावेज:

जीएसटी पंजीकरण के लिए, बिजनेस संरचना के अनुसार  विभिन्न दस्तावेजों की स्कैन की गई प्रतियां और कुछ अतिरिक्त व्यक्तिगत जानकारी की जरूरत होगी।

 1. व्यक्ति /एकल स्वामित्व (सोल प्रोप्राइटर) के लिए:

व्यक्ति का आधार कार्ड, पैन कार्ड, एवं फोटो।
वैध मोबाइल नंबर, एवं ईमेल आईडी ।
बिजनेस के स्थान का प्रमाण ।
बैंक खाते का विवरण।

 2. भागीदारी अथवा एल एल पीके लिए :

समस्त भागीदारों के आधार कार्ड पैन कार्ड,  एवं फोटो
बिजनेस के स्थान का प्रमाण ।
बैंक खाते का विवरण।

एल एल पी की स्थिति में संचालक मंडल का संकल्प एवं   एल एल पी पंजीकरण का प्रमाण पत्र।
अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता की नियुक्ति का प्रमाण प्राधिकार पत्र सहित

 3 कंपनी के लिए:

कंपनी का पैन कार्ड।
कम्पनी का पंजीयन प्रमाण पत्र ।
मेमोरंडम ऑफ एसोसिएशन (एमओए) / आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (एओए)।

सभी निदेशकों के आधार कार्ड पैन कार्ड एवं फोटो।
कपनी के बैंक खाते की जानकारी।
बिजनेस के स्थान का प्रमाण ।
प्राधिकार पत्र।

# 4 संयुक्त हिन्दू परिवार के लिए:

एचयूएफ पैन कार्ड।
कर्ता का आधार कार्ड पैन कार्ड, एवं फोटो।
व्यापार के स्थान का प्रमाण।
बैंक खाते की जानकारी।

 5 सोसायटी ट्रस्ट या क्लब के लिए:

सोशायटी ट्रस्ट या क्लब का पैन कार्ड।
सोशायटी ट्रस्ट या क्लब का पंजीयन प्रमाण पत्र ।
प्रवर्तकों/भागीदारों के पैन कार्ड  एवं फोटो।

बैंक अकाउंट की जानकारी ।
व्यवसाय के स्थान का प्रमाण स्वयं का अथवा किराए का  बिजली का बिल, लैंडलाइन का बिल, कानूनी स्वामित्व का दस्तावेज, संपत्ति कर रसीद, किरायानामा आदि
प्राधिकार पत्र।

 जीएसटी में दंड प्रावधान

जीएसटी में रजिस्ट्रेशन करवाना उन सभी के लिए जरूरी  है, जो नियमानुसार उसके दायरे मे आते हैं।

यदि कोई व्यक्ति जीएसटी की परिधि के अंतर्गत आता है, एवं उसके बाद भी वह रजिस्ट्रेशन नही कराता है।

तथा बिना रजिस्ट्रेशन के व्यापार करता है तो, उसे निम्नानुसार पेनल्टी का प्रावधान है :

यदि उसने टेक्स का भुगतान नहीं किया है या फिर कम भुगतान किया है, तो टेक्स का दस प्रतिशत या कम से कम दस हजार का आर्थिक दंड पेनल्टी।

बड़े रूप में जानबूझ कर टैक्स की चोरी की स्थिति में अपराधी को देय कर की राशि का 100% जुर्माना देना होगा।

अन्य वास्तविक त्रुटियों के लिए, जुर्माना कर का 10% है।

रजिस्ट्रेशन के बाद संबन्धित सभी रिटर्न भरना भी उतना ही जरुरी है। अन्यथा उस पर भी लेट फीस का प्रावधान है।

जीएसटी रिटर्न दाखिल करना?

जीएसटी के तहत अनुपालन करना बहुत सरल और आसान है।

उद्यमी “स्व-मूल्यांकन” मॉडल के तहत खुद के अनुपालन एवं कर का भुगतान स्व-मूल्यांकन के आधार पर कर सकता है।

रिटर्न को जीएसटीएन पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन दर्ज करना होगा।

जीएसटीएन आफलाइन उपयोगिताओं को नि: शुल्क प्रदान करता है।

जिससे छोटे और मध्यम करदाता ऑनलाइन हुए बिना चालान डेटा को संकलित करने और फाइलें उत्पन्न करने में सक्षम हो सकें।

इसे बाद में सुविधा अनुसार पोर्टल पर अपलोड किया जा सकता है।

जीएसटी पोर्टल पर प्रत्येक प्रक्रिया के लिए एम्बेडेड वीडियो के साथ कंप्यूटर आधारित प्रशिक्षण सामग्री उपलब्ध हैं।

प्रणाली को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि थोड़े से प्रयास के साथ करदाता द्वारा सब कुछ स्वयं किया जा सकता है,

जीएसटी “डू इट योरसेल्फ मॉडल” पर काम करता है।

जीएसटी कर प्रशासन की एक पारदर्शी प्रणाली है।  करदाता पंजीकरण, रिटर्न जमा करने, कर भुगतान और धनवापसी के दावों सहित अधिकांश अनुपालन केवल जीएसटीएन पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन होंगे।

इससे उद्यमियों को कर अनुपालन के बारे में चिंतित होने के बजाय अपने व्यवसाय पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलेगी।

 जीएसटी परिषद का निर्माण:

जीएसटी परिषद का निर्माण संविधान में 122वें संशोधन विधेयक के द्वारा  2016  में किया गया है।

जीएसटी परिषद की संरचना: जीएसटी परिषद की संरचना भारत के संशोधित संविधान के अनुच्छेद 279 (1) द्वारा निर्धारित की जाती है।

जीएसटी परिषद देश में जीएसटी नियमों के कार्यान्वयन के लिए शासी निकाय है।

जीएसटी परिषद को यह सुनिश्चित करने का काम सौंपा गया है कि पूरे भारत में वस्तुओं और सेवाओं पर जीएसटी की एक समान दर लागू हो।

जीएसटी परिषद जीएसटी मॉडल के तहत लागू कर की दर, कर छूट नियमों, जीएसटी रूपों को जमा करने की नियत तारीख, कर संबंधित कानूनों और समय सीमा और भारत के कुछ राज्यों के लिए विशेष छूट निर्धारित करने के लिए अधिकृत है।

वह इनके लिए बैठकों का आयोजन कर चर्चा एवं इनमें सिफारिशें कर सकती है

जीएसटी क्या है? लेख की लंबाई अधिक होने के कारण इसे जीएसटी क्या है? भाग 1 समझेंं तथा शेेेष सामग्री जीएसटी क्या है? भाग 2 मेंं पढ़ें।

निष्कर्ष:

जीएसटी से देश में अप्रत्यक्ष कर प्रशासन में अप्रत्याशित परिवर्तनकारी बदलाव आए हैं।

बदलाव कहीं भी हों।  हमेशा सभी वर्ग के लिए असहनीय ही होते हैं। क्योंकि शुरुआत में निश्चित रूप से कठिनाई तो होती ही है।

भविष्य में निश्चित ही यह सभी वर्गों के लिए लाभदायक   होगा। जीएसटी उद्यमियों के लिए उत्साहवर्धक और सुविधाभोगी रहेगा।

हमारा सुझाव है कि आप स्वेच्छा से जीएसटी रजिस्ट्रेशन का विकल्प चुनें। भले ही आपका टर्नओवर कम क्यों न हो।

दूसरे राज्यों में बेचने वाले उद्यमियों को टर्नओवर पर लक्ष्य ना देते हुए जीएसटी  पंजीयन कर लेना चाहिए।

क्योंकि अपंजीकृत उद्यमी खरीदी पर कर रिफंड का कोई लाभ नहीं उठा सकता।

हमें उम्मीद है कि आपको  जीएसटी क्या है? यह लेख पढ़कर अच्छा लगा होगा।

यदि आपके पास हमारे द्वारा प्रकाशित ब्लॉग के बारे में कोई प्रश्न या सुझाव हैं, तो आप उन्हें हमारे यहां भेज सकते हैं।

हम आपकी उन्नति हेतु और क्या मदद कर सकते हैं आप बेहिचक कमेंट्स में सूचित कर सकते हैं।

फिर मिलेंगे किसी ऐसे ही महत्वपूर्ण बिजनेस टापिक्स के साथ तब तक के लिए टाटा बाय बाय।

2 thoughts on “जीएसटी क्या है? आइए जानते हैं इसे क्यों शुरू किया गया है ?”

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